उत्तरकाशी, 10 अप्रैल।
रामचंद्र उनियाल राजकीय स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय उत्तरकाशी के वनस्पति विज्ञान विभाग के विद्यार्थियों ने 10 अप्रैल 2026 को हर्षिल क्षेत्र में शैक्षणिक भ्रमण किया। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को प्राकृतिक वातावरण में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों का प्रत्यक्ष अध्ययन कराना तथा उन पर जलवायु परिवर्तन और मानव गतिविधियों के प्रभावों को समझना था।
इस शैक्षणिक यात्रा का संचालन विभागाध्यक्ष डॉ. महेंद्रपाल सिंह परमार, डॉ. जयलक्ष्मी रावत एवं डॉ. रीना शाह के मार्गदर्शन में किया गया। इसमें वनस्पति विज्ञान के छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। दल ने हर्षिल के आसपास के गांवों, वनों एवं पर्वतीय क्षेत्रों का भ्रमण करते हुए वहां की जैव विविधता का गहन अवलोकन किया।
इस दौरान विद्यार्थियों ने लाइकेन (Lichen), जिम्नोस्पर्म्स (Gymnosperms), एंजियोस्पर्म्स (Angiosperms), टेरिडोफाइट्स (Pteridophytes), ब्रायोफाइटा (Bryophyta) तथा शैवाल (Algae) जैसे विभिन्न पादप समूहों का अध्ययन किया। उन्होंने इन वनस्पतियों की संरचना, आवास (Habitat), अनुकूलन (Adaptation) तथा पारिस्थितिक महत्व को समझा।
अध्ययन के दौरान यह भी स्पष्ट रूप से देखा गया कि जलवायु परिवर्तन का इन वनस्पतियों पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। तापमान में वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में बदलाव तथा हिमपात की कमी के कारण कई पौधों की वृद्धि दर, प्रजनन क्षमता एवं वितरण क्षेत्र में परिवर्तन देखने को मिला। कुछ संवेदनशील प्रजातियाँ धीरे-धीरे कम होती हुई भी पाई गईं। इसके अतिरिक्त, विद्यार्थियों ने मानव गतिविधियों के प्रभावों का भी अवलोकन किया। पर्यटन की बढ़ती गतिविधियां, वनों की कटाई, सड़क निर्माण तथा स्थानीय संसाधनों के अत्यधिक उपयोग के कारण प्राकृतिक वनस्पति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। कई स्थानों पर मृदा अपरदन (Soil Erosion) एवं वनस्पति क्षरण स्पष्ट रूप से देखा गया, जिससे पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित हो रहा है।
लाइकेन जैसे संवेदनशील जीवों की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर विद्यार्थियों ने वायु गुणवत्ता का भी आकलन किया। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि कुछ क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। इसी प्रकार, ब्रायोफाइट्स एवं टेरिडोफाइट्स की स्थिति से नमी एवं सूक्ष्म पर्यावरणीय परिवर्तनों का भी अध्ययन किया गया।
यह शैक्षणिक भ्रमण विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त ज्ञानवर्धक एवं अनुभवात्मक सिद्ध हुआ। इससे उन्हें न केवल सैद्धांतिक ज्ञान को व्यवहारिक रूप में समझने का अवसर मिला, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता भी विकसित हुई। इस प्रकार के अध्ययन से विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी सुदृढ़ होती है।


