उत्तराखंड राज्य आंदोलन का दर्द और ज्वलंत से रूबरू

Ramesh Kuriyal
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साथियों,

जिस जज़्बे से हमारे पुरखों ने अलग राज्य का सपना देखा था — अपनी बोली-भाषा, खान-पान, रहन सहन जल-जंगल-जमीन के मुताबिक विकास — वो सपना जमीन पर उतरते-उतरते कहीं धुंधला पड़ गया।

जिन्होंने नींव रखी थी
स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी जी का “पहाड़ की राजधानी पहाड़ में”, विपिन त्रिपाठी जी का त्याग, जसवंत सिंह बिष्ट जी, काशी सिंह ऐरी जी, पूरन सिंह डंगवाल जी, जीवन शर्मा जी और UKD, कम्युनिस्ट व क्षेत्रीय दलों के तमाम साथियों का मकसद साफ था — *सत्ता नहीं, व्यवस्था बदलनी थी*। पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आए।

जिन राष्ट्रीय दलों ने तब अलग राज्य का विरोध किया, बाद में वही सत्ता में आए। स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी जी का वो बयान आज भी कई लोगों को याद है। “1996 में राज्य नहीं तो चुनाव नहीं” का नारा देने वाले भी किनारे हो गए, और कुर्सी उन्हीं के पास चली गई जिनका संघर्ष में दूर-दूर तक नाम नहीं था।

1 रुपये वाला करोड़पति बन गया, पटाल-मटपत्री के घरों में रहने वाले सत्ता के चाटूकार फाइव स्टार का मालिक बन गया — ये पीड़ा सिर्फ राज्य आंदोलनकारी देवी सिंह पंवार की नहीं है। ये हर उस आंदोलनकारी की टीस है जिसने 1972 से लेकर 2000 तक गिलहरी की तरह, एक-एक तिनका जोड़कर राज्य बनाया।

पर एक बात याद रखिए
गिलहरी का योगदान रामसेतु में छोटा नहीं था। देवी सिंह पंवार ने बडोनी जी, ऐरी जी, बिष्ट जी, त्रिपाठी जी, डंगवाल जी, त्रिवेंद्र पंवार जी, दिवाकर भट्ट जी के साथ जो समय दिया, जो संघर्ष किया — वही असली पूंजी है। सत्ता तो आती-जाती है, पर इतिहास हमेशा पूछेगा कि जब पहाड़ के लिए खड़े होने का वक्त था, तो कौन खड़ा था।
राज्य निर्माण करने वाले समर्पित
राज्य आंदोलनकारी न होते तो शायद आज उत्तराखंड नाम का राज्य भी न होता। व्यवस्थाएं बिगड़ सकती हैं, पर जो बीज ईमानदारी से बोया गया है, वो एक दिन जरूर पेड़ बनेगा।

देवी सिंह पंवार

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