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लालढांग में हाथी रोधी दीवार अटकी: 1960 से पुराने रिकॉर्ड गायब, जमीन के मालिकाना हक पर पेंच

देहरादून। लालढांग रेंज में हाथियों के हमलों से सुरक्षा के लिए प्रस्तावित 1402 मीटर लंबी दीवार का निर्माण फिलहाल कागजों में ही अटका हुआ है। सिम्बलखाल से सिडकुल तक बनने वाली इस दीवार पर जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद गहराता जा रहा है।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने 19 नवंबर 2024 को दीवार निर्माण में तेजी लाने के निर्देश दिए थे, लेकिन वन विभाग और राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में अंतर होने से अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। मामला तब और उलझ गया जब 1960 से पहले के राजस्व अभिलेख ही सरकारी रिकॉर्ड में नहीं मिले।

वन विभाग की ओर से एनजीटी में दाखिल शपथ पत्र में प्रभागीय वनाधिकारी (कोटद्वार) जीवन दगाड़े ने बताया कि विवादित भूमि से जुड़े पुराने नक्शे और खतौनी अभिलेख खोजने के लिए हर संभव प्रयास किए गए, लेकिन सरकारी अभिलेखागार में कोई दस्तावेज नहीं मिल सके। राजस्व परिषद देहरादून और जिला भू-लेख कार्यालय पौड़ी से भी पत्राचार किया गया, लेकिन वहां से भी कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई।

शासन और जिलाधिकारी हरिद्वार की रिपोर्ट के अनुसार, 1960 से पूर्व के बंदोबस्ती नक्शे और रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं, जिससे भूमि स्वामित्व तय करना मुश्किल हो गया है। अब मामले को उच्च स्तर पर उठाते हुए गढ़वाल आयुक्त के साथ समन्वय कर प्रशासनिक समाधान तलाशने के निर्देश दिए गए हैं।

यह मामला मोहन चंद्र सती की याचिका के बाद चर्चा में आया। क्षेत्र में हाथियों के बढ़ते हमलों को देखते हुए एनजीटी ने दीवार निर्माण के निर्देश दिए थे।

यही है विवाद की जड़
वन विभाग इस क्षेत्र को लालढांग रेंज का आरक्षित वन क्षेत्र बता रहा है, जबकि राजस्व रिकॉर्ड में इसे आसपास के गांवों की जलमग्न भूमि के रूप में दर्ज किया गया है। जब तक पुराने रिकॉर्ड से जमीन का वास्तविक स्वामित्व स्पष्ट नहीं होता, तब तक करोड़ों रुपये की इस परियोजना पर काम शुरू करना संभव नहीं है।

वैकल्पिक योजना पर भी विचार
विवाद लंबा खिंचने की स्थिति में वन विभाग ने वैकल्पिक योजना भी तैयार की है। इसके तहत वन भूमि के भीतर हाथी रोधक खाई (ट्रेंच) और सोलर फेंसिंग लगाने का प्रस्ताव है। फिलहाल क्षेत्र की निगरानी के लिए 15 कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं।

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