उत्तरकाशी। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उत्तरकाशी में करीब 21 वर्षों तक अध्यापन और लगभग तीन दशकों तक शिक्षा एवं सामाजिक जीवन से जुड़े रहने के बाद प्रोफेसर ने उत्तरकाशी को भावुक शब्दों में विदाई दी। उन्होंने कहा कि उत्तरकाशी उनके लिए केवल कार्यस्थल नहीं, बल्कि जन्मभूमि, कर्मभूमि, पहचान और जीवन की अमूल्य स्मृतियों का अभिन्न हिस्सा है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1995 में एक छात्र के रूप में राजकीय महाविद्यालय, उत्तरकाशी में प्रवेश किया था। वर्ष 2006 में इसी महाविद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली। इस दौरान उन्हें शिक्षा के साथ-साथ समाजसेवा और विभिन्न सामाजिक एवं शैक्षिक संगठनों में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिला।
उन्होंने बताया कि रोटरी क्लब, उत्तरकाशी में दो बार अध्यक्ष और दो बार सचिव के रूप में लगभग 18 वर्षों तक सेवा दी। राष्ट्रीय शैक्षिक महासंगठन में प्रांतीय कोषाध्यक्ष, देवभूमि विचार मंच में संयोजक तथा विभिन्न शिक्षण संस्थानों में मार्गदर्शक एवं मेंटर के रूप में कार्य किया। गोस्वामी गणेश दत्त विद्या मंदिर, केंद्रीय विद्यालय मनेरा, वीर माधो सिंह भंडारी अभियंत्रण महाविद्यालय सहित अनेक संस्थानों में स्टार्टअप, नवाचार, जड़ी-बूटी संरक्षण, आजीविका एवं रोजगारपरक गतिविधियों को बढ़ावा दिया।
उन्होंने उत्तरकाशी में आई आपदा के दौरान राहत शिविरों और सेवा कार्यों में साथियों के सहयोग से सक्रिय भूमिका निभाने का भी उल्लेख किया। वर्ष 2021 में वनस्पति विज्ञान विभाग में वर्चुअल लैब और शैक्षणिक उद्यान की स्थापना कर विद्यार्थियों को प्रकृति एवं जैव विविधता से जोड़ने का प्रयास किया।
प्रोफेसर ने बताया कि वर्ष 2022 में महाविद्यालय के इतिहास का भव्य पूर्व छात्र सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत पूर्व छात्र शामिल हुए। सम्मेलन के दौरान पूर्व छात्र परिषद का गठन किया गया, जो आज भी आर्थिक रूप से कमजोर एवं जरूरतमंद विद्यार्थियों की सहायता कर रही है। पूर्व छात्रों के सहयोग से महाविद्यालय को गीजर, वाटर कूलर, पंखे तथा छात्र सहायता कोष सहित अनेक संसाधन प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि यह परिषद आज भी सामाजिक कार्यों और आपदा राहत अभियानों में सक्रिय योगदान दे रही है।
उन्होंने यह भी बताया कि उनके प्रयासों से उत्तरकाशी के बीरपुर एवं बगोरी क्षेत्र के भोटिया समुदाय के पारंपरिक उत्पाद ‘दन्न’ को भौगोलिक संकेतक (जीआई) का दर्जा प्राप्त हुआ, जो जनपद का पहला जीआई पंजीकरण है।
उन्होंने अपने शैक्षणिक जीवन का उल्लेख करते हुए बताया कि स्विट्जरलैंड, फ्रांस, नीदरलैंड, बेल्जियम, सिंगापुर, दुबई, भूटान और नेपाल सहित कई देशों में शोधपत्र प्रस्तुत करने का अवसर मिला। वहीं विद्यार्थियों को भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण, जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान, गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान, दयारा बुग्याल, हर्षिल, जादूंग, रैथल सहित अनेक स्थलों का शैक्षणिक भ्रमण भी कराया गया।
उन्होंने कहा कि उनकी इच्छा थी कि उत्तरकाशी की इस पावन भूमि से ही सेवानिवृत्त हों, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें रामनगर में नई जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया।
अपने संदेश के अंत में उन्होंने सभी पूर्व छात्रों, सहकर्मियों, विद्यार्थियों, नगरवासियों और शुभचिंतकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तरकाशी से उनका रिश्ता कभी समाप्त नहीं होगा। उन्होंने सभी के स्नेह, विश्वास और सहयोग को अपनी सबसे बड़ी पूंजी बताते हुए भविष्य में भी इसी आत्मीयता और आशीर्वाद की कामना की।



