बांग्ला देश के मुक्ति संघर्ष को केन्द्र मान कर निकला था ” दहकते स्वर “

Ramesh Kuriyal
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संस्मरण

_ डाअतुल शर्मा

मुझे याद 1971 । मुक्ति वाहिनी । बांग्ला देश का उदय । युद्ध ।साथ ही साहित्यकार कवियों की अभिव्यक्ति ।सृतियो मे अंकित है ।भारत की संघर्ष यात्रा ।
तब देहरादून मे भी साहित्यकार कवि हमेशा अपनी भागीदारी निभाते रहे हैं ।राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्थियो पर रचनाये होती रही हैं ।
इसी के सम्बोधित एक संस्मरण मुझे आज याद आ रहा है ।मुझे कहा गया कि एक काव्य सन्ग्रह प्रकाशित हो रहा है जिसमे देहरादून के लगभग सभी कवियो की कविताये छपेगी । तो आपकी भी कविता उसमे आनी चाहिये । आपकी कविता के बिना इसकी कल्पना नही की जा सकती ।
मै उस समय शायद 16_17 बरस का था ।


कहा गया कि कवियो का पुस्तक मे जो छपने का क्म होगा वह उम्र के आधार पर होगा ।तो सबसे बड़ी उम्र के कवि थे रत्नाम्बर दत्त चंदोला जी और सबसे छोटी उम्र का कवि मै ।वे शायद 71 साल के और मै 17 साल का ।
खैर । वह संग्रह ” दहकते स्वर ” छपा 1972 मे । उसका मूल्य था मात्र तीन रुपया ।
इसका विमोचन देश के प्रख्यात लेखिक डा राम कुमार वर्मा ने एम के पी कालेज मे हुआ था ।सभी प्रकाशित कवियो को श्रीफल शाल व यह संग्रह भेट किया डा वर्मा ने । इसमे 36कवियो की कविताये छपी ।
इनमे से वे भी थै जो अब शीर्ष पर है और तब नवोदित थे ।
बांग्ला देश के मुक्ति संघर्ष को केन्द्र मान कर यह कविता संग्रह देहरादून की जनप्रतिबदृधता को दिखाता है ।
इस के सम्पादक मनोहर लाल श्रीमन और सुखवीर विश्वकर्मा थे । विमोचन समारोह का संचालन स्वाधीनता सेनानी कवि श्री राम शर्मा प्रेम ने किया था ।

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