उत्तरकाशी। स्वर्गीय महिमा नन्द कुड़ियाल उत्तरकाशी के ऐसे सम्मानित व्यक्तित्व थे, जिनकी मेहनत, दूरदर्शिता और संस्कारों ने आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायी विरासत छोड़ी। इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए उनके सुपुत्र कृष्णा कुड़ियाल ने स्थापत्य कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर न केवल उत्तरकाशी बल्कि पूरे उत्तराखंड का मान बढ़ाया है।
करीब 38 वर्ष पहले पिता के निधन के बाद भी कृष्णा कुड़ियाल ने हिम्मत नहीं हारी। शिक्षा और संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए उन्होंने आर्किटेक्चर के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। वर्ष 2000 में उन्होंने महानगरों की सुविधाजनक जीवनशैली छोड़कर अपने गृह जनपद उत्तरकाशी लौटने का निर्णय लिया और भटवाड़ी रोड पर अपनी आर्किटेक्चरल प्रैक्टिस शुरू की। उनका यह कदम केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति और पारंपरिक स्थापत्य को संरक्षित करने का संकल्प था।
अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें प्रदेश के दूरस्थ इलाकों की संस्कृति, परंपरा और पारंपरिक निर्माण शैली को करीब से समझने का अवसर मिला। स्थानीय कारीगरों के साथ मिलकर उन्होंने पारंपरिक वास्तुकला को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ने का काम किया।
इसी समर्पण का परिणाम है कि वह अब तक प्रदेश में करीब 175 छोटे-बड़े मंदिरों के निर्माण और पुनर्निर्माण से जुड़े हैं। इनमें धारी देवी, सुरकंडा देवी, बिसोई महासू देवता मंदिर, सेम नागराजा, विकासनगर खाटू श्याम मंदिर, कंडार देवता, औणेश्वर, विमलेश्वर, लक्षेश्वर, सोमेश्वर और राजराजेश्वरी जैसे प्रमुख मंदिर शामिल हैं, जिनके निर्माण और सौंदर्यीकरण में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
कृष्णा कुड़ियाल का यह कार्य केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि देवभूमि की प्राचीन आस्था, संस्कृति और स्थापत्य परंपरा को सहेजने और पुनर्जीवित करने का प्रयास है। यही वजह है कि आज उत्तरकाशी में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है और उनके कार्यों के माध्यम से उत्तराखंड की स्थापत्य कला को देश-दुनिया में नई पहचान मिल रही है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।


