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‘सास-बहू की गुफ्तगू’ से चर्चित राधिका अम्मा का निधन

Ramesh Kuriyal
3 Min Read

अल्मोड़ा। सोशल मीडिया पर ‘राधिका अम्मा’ और ‘सास-बहू की गुफ्तगू’ के नाम से पहचान बनाने वाली श्रीमती राधिका तिवारी का 85 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप शुक्रवार को उनका पार्थिव शरीर शोध एवं चिकित्सा शिक्षा के लिए अल्मोड़ा स्थित सोबन सिंह जीना राजकीय आयुर्विज्ञान एवं शोध संस्थान (मेडिकल कॉलेज) को देहदान कर दिया गया।

राधिका तिवारी का जीवन संघर्ष, आत्मसम्मान और सामाजिक जागरूकता का प्रेरक उदाहरण रहा। अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया विकासखंड के ग्राम घुंघोली, बसभीड़ा निवासी राधिका तिवारी के पति धाराबल्लभ तिवारी का निधन उस समय हो गया था, जब उनकी उम्र मात्र 21 वर्ष थी। पति के निधन के बाद उन्होंने अकेले ही खेती-किसानी कर अपने इकलौते पुत्र ललित तिवारी का पालन-पोषण किया और उन्हें शिक्षा दिलाकर सरकारी सेवा तक पहुंचाया।

हालांकि नियति ने उन्हें एक और गहरा आघात दिया। 27 जुलाई 1988 को एक दुर्घटना में उनके पुत्र ललित तिवारी का भी निधन हो गया। इस कठिन दौर में उनकी बहू, शिक्षिका एवं लेखिका दीपा तिवारी उनका सबसे बड़ा सहारा बनीं। दुख और संघर्ष के बीच सास-बहू का रिश्ता दोस्ती और विश्वास की मिसाल बन गया, जिसे सोशल मीडिया पर ‘सास-बहू की गुफ्तगू’ के नाम से लाखों लोगों ने सराहा।

राधिका तिवारी सामाजिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहीं। वर्ष 1984 में बसभीड़ा से शुरू हुए ऐतिहासिक ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह प्रत्येक वर्ष आंदोलन की वर्षगांठ पर मंच से अपने विचार बेबाकी से रखती थीं और समाज में जनजागरूकता का संदेश देती थीं।

पारंपरिक पहाड़ी परिवेश में पली-बढ़ी राधिका तिवारी ने जीवन के अंतिम पड़ाव में सामाजिक रूढ़ियों और अंधविश्वासों से ऊपर उठकर देहदान का संकल्प लिया। अपनी बहू दीपा तिवारी की प्रेरणा से उन्होंने यह निर्णय लिया था, जिसे उनके निधन के बाद परिवार ने सम्मानपूर्वक पूरा किया।

परिजनों ने बताया कि राधिका तिवारी की अंतिम इच्छा के अनुसार उनका पार्थिव शरीर मेडिकल कॉलेज को शोध कार्य के लिए समर्पित किया गया है। साथ ही उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए परिवार ने किसी भी प्रकार का पारंपरिक क्रिया-कर्म नहीं करने का निर्णय लिया है।

अपने संघर्ष, साहस, सामाजिक सरोकार और प्रगतिशील सोच के कारण राधिका तिवारी हमेशा लोगों की स्मृतियों में जीवित रहेंगी।

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