थौलधार (टिहरी गढ़वाल)। कभी पहाड़ों में खेती जीवन का मुख्य आधार हुआ करती थी, लेकिन पलायन और बदलते दौर के साथ हजारों खेत वीरान और बंजर हो गए। अब कुछ युवा इन्हीं खेतों को दोबारा आबाद करने की कोशिश में जुटे हैं। टिहरी गढ़वाल के थौलधार ब्लॉक के पैतृक गांव क्यारी नगुण निवासी रामलाल नौटियाल उर्फ ‘लब्बू’ भी ऐसे ही युवाओं में शामिल हैं, जिन्होंने बंजर पड़ी जमीन पर सेब की बागवानी शुरू कर आत्मनिर्भरता की राह पकड़ी है।
शिक्षा के साथ सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे रामलाल के मन में कुछ अलग करने की इच्छा थी। इसी सोच के साथ उन्होंने गांव में लंबे समय से बंजर पड़ी अपनी पैतृक जमीन पर सेब के पौधे लगाने का फैसला किया। उद्यान विभाग से जानकारी और मार्गदर्शन लेने के बाद उन्होंने बागवानी शुरू की। आज उनके बाग में करीब 200 सेब के पेड़ तैयार हो चुके हैं।
इस काम में परिवार ने भी उनका पूरा साथ दिया। उनके पिता कुलानंद नौटियाल सहित परिवार के सदस्यों ने खेत तैयार करने, गड्ढे खोदने और पौधरोपण में सहयोग किया। बेटे कुश और लव के अलावा भाई प्रमोद और प्यारे नौटियाल भी इस प्रयास में उनके साथ खड़े रहे।
युवाओं को जमीन को अवसर के रूप में देखने की सलाह
रामलाल नौटियाल का कहना है कि पहाड़ के युवाओं को अपनी जमीन और स्थानीय संसाधनों को बोझ नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखना चाहिए। सही जानकारी, वैज्ञानिक सोच, आधुनिक कृषि तकनीक और निरंतर मेहनत के जरिए पहाड़ की जमीन को आय और रोजगार का माध्यम बनाया जा सकता है। नगर पंचायत कीर्तिनगर के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ चुके रामलाल का मानना है कि उद्यान विभाग की योजनाओं और उपलब्ध सुविधाओं का लाभ लेकर बागवानी को व्यवसाय के रूप में विकसित किया जा सकता है।
पहाड़ लौटने से पहले आर्थिक तैयारी जरूरी
हालांकि रामलाल अपने अनुभव से युवाओं को एक अहम संदेश भी देते हैं। उनका कहना है कि मैदानी शहरों में अच्छा रोजगार कर रहे युवाओं को केवल भावनात्मक लगाव के कारण नौकरी या व्यवसाय छोड़कर पहाड़ लौटने का फैसला जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए। पहाड़ की परिस्थितियों, बाजार, पानी, मौसम और सरकारी नीतियों को समझने के बाद ही कोई योजना बनानी चाहिए।
रामलाल कहते हैं, “पहाड़ में हर कदम पर संघर्ष है। यहां बिना संघर्ष के न पानी मिलता है और न ही आसानी से रोजी-रोटी का इंतजाम होता है। इसलिए पहाड़ लौटने से पहले कम से कम पांच साल का आर्थिक बैकअप तैयार करके आना चाहिए।”
अब 5 हजार सेब के पेड़ लगाने का लक्ष्य
रामलाल अब अपने प्रयास को बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी में हैं। उनका लक्ष्य करीब 5 हजार सेब के पेड़ लगाने का है। इसके लिए वह लगातार तैयारी और प्रयास कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि यह योजना सफल होती है तो इससे न केवल उन्हें आर्थिक लाभ मिलेगा, बल्कि क्षेत्र के अन्य युवाओं और किसानों को भी बागवानी के जरिए रोजगार और आय के नए अवसर तलाशने की प्रेरणा मिलेगी।
जिस जमीन को लोग बंजर समझकर छोड़ चुके थे, उसी में रामलाल ने उम्मीद के पौधे रोपे हैं। आज करीब 200 सेब के पेड़ उनकी मेहनत और संकल्प की कहानी कह रहे हैं। अब 5 हजार पेड़ों का लक्ष्य इस प्रयास को नई ऊंचाई देने की तैयारी है।



