देहरादून। नेपाल की हालिया त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा के बदलते स्वरूप को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। पहाड़ों में खतरा केवल तेज बारिश तक सीमित नहीं है। हिमनद, हिमस्खलन, भूस्खलन और नदी में मलबे का जमाव एक-दूसरे से जुड़कर ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जिसमें सामान्य बाढ़ भी बेहद विनाशकारी रूप ले लेती है। ऐसे में आपदा प्रबंधन को केवल बारिश और नदी के जलस्तर की निगरानी तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा।
डीबीएस पीजी कॉलेज देहरादून के भूविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष एवं भूवैज्ञानिक डॉ. दीपक भट्ट के अनुसार हिमालय की संवेदनशीलता को देखते हुए आपदा के सभी संभावित कारणों की एक साथ निगरानी जरूरी है। खासतौर पर ऐसे ढलानों और स्थानों की पहचान करनी होगी, जहां भूस्खलन से नदी का प्रवाह रुक सकता है। नदी में मलबा जमा होने से अस्थायी बांध बन सकता है। इसके पीछे पानी और कीचड़ जमा होने के बाद यदि यह अवरोध अचानक टूटे तो भारी मात्रा में पानी और मलबा तेज गति से नीचे की ओर बढ़ सकता है। ऐसे बहाव की चपेट में आने वाली नदी किनारे की बसावटों को संभलने या सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
नेपाल की घटना का एक बड़ा सबक नदी घाटियों में बढ़ती बसावट भी है। सड़क, पर्यटन और विकास गतिविधियों के विस्तार के साथ कई क्षेत्रों में आबादी नदी के करीब पहुंच गई है। विशेषज्ञ के अनुसार संवेदनशील घाटियों में निर्माण और बसावट से पहले भूगर्भीय जोखिम का आकलन होना चाहिए। नदी किनारे अनियोजित निर्माण आपदा के प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकता है।
डॉ. भट्ट का कहना है कि हिमालय में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी। प्राकृतिक प्रक्रियाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन जान-माल की क्षति को कम किया जा सकता है। इसके लिए संवेदनशील ढलानों और गांवों की वैज्ञानिक मैपिंग, भूस्खलन व नदी अवरोधों की निगरानी और प्रभावी पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करना होगा। खतरे के संकेत मिलते ही लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की स्थानीय व्यवस्था भी जरूरी है। ग्रामीणों को आपदा के दौरान त्वरित निकासी का प्रशिक्षण देने से नुकसान कम किया जा सकता है। हिमालय की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप विकास और ग्रामीण जीवन के बीच संतुलन बनाना ही भविष्य की ऐसी त्रासदियों का प्रभाव कम करने का सबसे व्यावहारिक रास्ता है।
हिमालय में एक आपदा बन सकती है दूसरी की वजह

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