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लोगों की जुबान परछाया है तोलाराम तोपची

Ramesh Kuriyal
3 Min Read

देहरादून। उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पारंपरिक लोकगीतों में पहाड़ के इतिहास, संघर्ष और लोकनायकों की अनेक कहानियां आज भी जीवित हैं। इन्हीं लोकस्मृतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल सकनियाना गांव निवासी कलाकार सोहनलाल ने की है। उन्होंने करीब 70 वर्ष पहले के चर्चित निशानेबाज तुलाराम तोबची की स्मृतियों से जुड़े पारंपरिक चैत गीत को नए अंदाज में प्रस्तुत किया है।

तुलाराम तोबची अपने समय के जाने-माने निशानेबाजों में शामिल रहे थे। उनके जीवन और व्यक्तित्व से जुड़ी लोककथाएं और गीत उस दौर में ग्रामीण समाज में काफी लोकप्रिय रहे। तुलाराम तोबची से जुड़ा यह गीत कलाकार के परिवार की पुरानी लोकस्मृति का हिस्सा भी रहा है।

शुक्री गांव निवासी लोक गायक एवं कलाकार सोहनलाल बताते हैं कि उनके दादा गुरदास और पिता भैरव दास भी चैत के महीने में इस गीत को गाया करते थे। बचपन से ही वह इस लोकगीत और इसकी धुन से जुड़े रहे। समय के साथ जब पुरानी लोकधुनें और पारंपरिक गीत लोगों की स्मृतियों से दूर होने लगे तो उन्होंने इसे नए अंदाज में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।

पुरानी धुन, नया अंदाज

सोहनलाल ने बताया कि मूल लोकगीत की भावनाओं और पारंपरिक आत्मा को बरकरार रखते हुए इसे आज के संगीत और गायकी के अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। उनका उद्देश्य नई पीढ़ी को उत्तराखंड की लोकपरंपरा, गांवों के इतिहास और पुराने लोकनायकों से जोड़ना है।

उन्होंने कहा कि यह गीत उनके लिए महज संगीत प्रस्तुति नहीं, बल्कि दादा और पिता से मिली लोकविरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास है। चैत के अवसर पर पुरानी पीढ़ी जिन गीतों को गाया करती थी, उन्हें नए स्वरूप में लोगों तक पहुंचाना लोकसंस्कृति को जीवित रखने की दिशा में एक छोटी सी कोशिश है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि लोग इस नए रूप को पसंद करेंगे और इसे उसी स्नेह के साथ स्वीकार करेंगे, जिस तरह पुरानी पीढ़ियां इन लोकगीतों को अपनी संस्कृति और स्मृतियों का हिस्सा मानती रही हैं।

सोहनलाल ने कहा, “यह गीत तुलाराम तोबची की स्मृतियों और हमारे परिवार की लोकपरंपरा से जुड़ा है। हमारे दादा और पिता इसे चैत के समय गाया करते थे। मैंने उसी गीत को नए अंदाज में प्रस्तुत करने की कोशिश की है।”

यह प्रस्तुति एक पुराने लोकगीत को नया जीवन देने के साथ ही पहाड़ की उन लोकस्मृतियों को भी सामने लाती है, जिनमें गांव, लोकनायक, परिवार और संस्कृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े रहे हैं।

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