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गंगा के मायके गंगोत्री-गोमुख क्षेत्र में डा.हर्षवन्ती बिष्ट ने जगाई पर्यावरण संरक्षण की अलख

Ramesh Kuriyal
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प्रस्तुति- डा.के.एल.तलवाड़

पहाड़ की बेटी डा.हर्षवन्ती बिष्ट पर्वतारोहण और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए एक जाना पहचाना नाम है। उनका मानना है कि तीर्थ यात्रियों की बढ़ती संख्या तथा अनियोजित तीर्थाटन/पर्यटन से उच्च हिमालयी क्षेत्रों के सुंदर स्थल बड़ी तेजी से कचरे के ढेर में तब्दील हो रहे हैं साथ ही सिमटते जंगल और प्रदूषित होती नदियां उत्तराखंड के पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं।अपनी इस चिन्ता के चलते उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का संदेश देने के लिए गंगोत्री -गोमुख क्षेत्र को चुना। वर्ष 1993 में वन विभाग उत्तरकाशी ने गंगोत्री से 9 किमी आगे गोमुख मार्ग में,जो कि 11700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है,में भोज एवं ऊंचाई पर उगने वाली वनस्पतियों की पौधशाला बनाने की अनुमति प्रदान की।

बाद में इन पौधों को चीड़बासा से 5 किमी आगे 12500 फीट की ऊंचाई पर भोजवासा नामक स्थान पर वर्ष 1995 में रोपण करने की अनुमति भी वनविभाग उत्तरकाशी से प्राप्त की और सर्वप्रथम 1996 में लगभग ढाई हेक्टेयर क्षेत्रफल पर भोज,भांगिल व पहाड़ी पीपल के 2500 पौधों का मिश्रित वन तैयार करने का पहला प्रयास किया गया। ऊंचाई, ठंडी जलवायु तथा रेतीली जमीन होने के कारण शुरुआत में इन पौधों का विकास धीमा रहा लेकिन समय के साथ कड़ी मेहनत रंग लाई और भोजवासा में रोपित पौधों का विकास होने लगा।

1997 में भोजवासा से एक किमी आगे गोमुख मार्ग से नीचे तथा भागीरथी नदी के ऊपर लगभग 5 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर भोज व भागिंल के पौधों को रोपा गया। आज शैशवावस्था में यह वृक्ष लहराते नजर आते हैं। भोजवृक्षों के नाम से जाना जाने वाला यह भू-भाग भोज वृक्ष विहीन हो गया था। सूखे भोज के ठूंठ व इक्का-दुक्का भोज व भांगिल इस क्षेत्र में पुराने भोज वन की याद दिलाते थे। इन्हीं ठूंठों से प्रेरणा लेकर डा.हर्षवंती ने भोजवासा जैसे कठिन भूभाग में वनीकरण किया।

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