उत्तराखंड

स्वास्थ्य और सेवा का संगम: जब सीमांत तक पहुँचा विशेषज्ञ का स्वर

दुर्गा प्रसाद नौटियाल
11 सुभाष रोड देहरादून
उत्तराखंड के सीमांत और सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य आज भी केवल उपचार का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संघर्ष का पर्याय है। विशेषकर मस्तिष्क, रीढ़ और नसों से जुड़ी न्यूरोलॉजिकल बीमारियाँ समय पर विशेषज्ञ तक न पहुँच पाने के कारण भय, अंधविश्वास और स्थायी पीड़ा में बदल जाती हैं। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियाँ, सीमित संसाधन और जानकारी का अभाव—इन सबके बीच देहरादून जैसे शहरों तक पहुँचना अनेक परिवारों के लिए आज भी एक कठिन सपना बना हुआ है।

इसी यथार्थ के बीच प्रसिद्ध यूट्यूबर शशि भूषण मैठाणी और वरिष्ठ न्यूरो सर्जन डॉ. महेश कुड़ियाल के बीच हुआ संवाद केवल एक पॉडकास्ट नहीं, बल्कि सीमांत के लिए स्वास्थ्य चेतना का सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। यह संवाद उस दूरी को पाटने का प्रयास है, जो वर्षों से विशेषज्ञ चिकित्सा और आम जन के बीच बनी रही है।

हमारे समाज में आज भी न्यूरो रोगों को लेकर भय और भ्रम गहराई से व्याप्त हैं। “नस की बीमारी लाइलाज होती है” या “दिमाग का इलाज मतलब जीवन का अंत”—ऐसी धारणाएँ रोगी को समय रहते उपचार से दूर कर देती हैं। डॉ. महेश कुड़ियाल ने सरल, वैज्ञानिक और मानवीय भाषा में इन मिथकों को तोड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिकांश सिर दर्द, कमर दर्द, स्लिप डिस्क, सायटिका और स्पाइन से जुड़ी समस्याएँ समय पर पहचान और सही सलाह से बिना ऑपरेशन भी नियंत्रित की जा सकती हैं। न्यूरो सर्जरी अंतिम विकल्प है, भय का कारण नहीं।

आज जिन लक्षणों को समाज ‘सामान्य’ समझकर टाल देता है—लगातार सिर दर्द, पैरों में झनझनाहट, गर्दन और कमर की पीड़ा—वही आगे चलकर गंभीर विकलांगता का कारण बनते हैं। यह संवाद अंधविश्वास के विरुद्ध विज्ञान का स्पष्ट पक्ष रखता है और यह संदेश देता है कि झाड़-फूंक नहीं, बल्कि समय पर चिकित्सकीय सलाह ही जीवन और भविष्य दोनों की रक्षा करती है।

डॉ. महेश कुड़ियाल केवल एक कुशल न्यूरो सर्जन नहीं, बल्कि शिक्षक और शोधकर्ता भी हैं। उनके वर्षों के अनुभव ने यह स्थापित किया है कि सही समय पर दी गई सही सलाह जटिल से जटिल न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का समाधान कर सकती है। वहीं शशि भूषण मैठाणी की भूमिका इस संवाद को सामाजिक अर्थ देती है—उन्होंने सीमांत के उन लोगों की आवाज़ को मंच दिया, जो आर्थिक या शारीरिक कारणों से स्वयं विशेषज्ञ तक नहीं पहुँच सकते।

यह संवाद स्वास्थ्य को केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में भी रेखांकित करता है। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के दर्द को नज़रअंदाज़ करना केवल लापरवाही नहीं, आने वाली पीढ़ियों के प्रति अन्याय है।

इस प्रयास का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यहाँ डिजिटल माध्यम मनोरंजन नहीं, बल्कि सेवा और समाधान का पुल बनता है—जहाँ सीमांत के प्रश्न सीधे विशेषज्ञ तक पहुँचते हैं और विशेषज्ञ का ज्ञान सीधे जनता तक।

अंततः, एक स्वस्थ समाज ही सशक्त समाज की आधारशिला रखता है। शशि भूषण मैठाणी का यह प्रयास और डॉ. महेश कुड़ियाल की वैज्ञानिक, संवेदनशील प्रस्तुति यह सिद्ध करती है कि जब सेवा, ज्ञान और संवेदना एक साथ आते हैं, तो समाधान स्वयं रास्ता बना लेते हैं।

क्योंकि एक सही जानकारी—किसी पूरे परिवार को टूटने से बचा सकती है।

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