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NGT के नाम पर प्रशासन भ्रम फैला रहा है, सरकार के दोहरे चरित्र पर उठे सवाल

Ramesh Kuriyal
5 Min Read

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) के आदेशों पर झूठे प्रचार कर प्रशासन लोगों एवं स्कूलों को हटाने की कोशिश कर रहा है। इसके अतिरिक्त, सरकार तीन साल रोक वाला अधिनियम पर प्रचार कर, अंदरूनी उसी कानून को पीछे के दरवाजे द्वारा रद्द  कराने की कोशिश कर रही है।  आज विपक्षी दलों एवं जन संगठनों ने यह गंभीर आरोप लगाया।  उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि कांठ बांग्ला का ज़बरन विस्थापन को ले कर प्रशासन ने उच्चतम न्यायलय के 10.02.2025 के एवं एनजीटी के 17.03.2025 के आदेशों का उल्लेख किया है – लेकिन यह दोनों आदेश बेदखली के आदेश नहीं हैं। चन्दर रोड के प्राथमिक
स्कूल को तोड़ ने के पत्र में एनजीटी के 18.08.2025 के आदेश का उल्लेख है, लेकिन यह भी बेदखली के आदेश नहीं है।  इसके आलावा एनजीटी के दिसम्बर 2024 के आदेश में असंवैधानिक तरीकों से 2018 के तीन साल वाले बस्ती अधिनियम को कमज़ोर करने की कोशिश की गयी थी – जिसपर आज तक सरकार एक भी कदम नहीं उठा पाई है। यह सरकार का दोहरापन है।  मौजूदा विपक्षी दलों एवं संगठनों ने तय किया कि इस दोहरापन को बेनक़ाब करने के लिए एवं मज़दूरों और गरीबों के अधिकार के लिए आगामी महीनों में ज़मीनी स्तर पर एवं सोशल मीडिया और मीडिया द्वारा अभियान चलाया जायेगा।

बैठक में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय शर्मा एवं प्रवीण त्यागी; भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय काउंसिल सदस्य समर भंडारी; समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव डॉ सत्यनारायण सचान; चेतना आंदोलन के शंकर गोपाल एवं राजेंद्र शाह; और अन्य प्रतिनिधि शामिल थे।

आदि जानकारी के लिए निम्नलिखित “टाइमलाइन” को देखे।

निवेदक

दून समग्र विकास अभियान

टाइमलाइन

2016 – उत्तराखंड विधान सभा द्वारा सर्वसम्मति से अधिनियम पारित होता है जिसके तहत राज्य के सारी मलिन बस्तियों में सर्वेक्षण कर उनका पुनर्वास या उनका नियमितीकरण होना था।  इस अधिनियम के अमल पर आज तक वर्तमान भाजपा  सरकार  ने कोई भी कदम नहीं उठा या है।

अक्टूबर 2018 – उत्तराखंड विधान सभा द्वारा सर्वसम्मति से अधिनियम पारित होता है जिसके तहत मार्च 2016 में जो स्थिति थी, उसी स्थिति को नौ साल तक बनाई  रखनी होगी ताकि सरकार 2016 के कानून के तहत इस समस्या के लिए स्थायी समाधान नहीं निकालती है। इसके बाद भी 2016 के कानून पर कोई अमल नहीं होता है।

अप्रैल 2024 से जून 2024 – निरंजन बागची बनाम उत्तराखंड सरकार याचिका में NGT के आदेशों के तहत रिस्पना नदी किनारे आधा अधूरा सर्वे के बाद 525 बिल्डिंगों को तोड़ने का योजना बनता है, काफी आंदोलन होने के बाद उनमें से 400 से ज्यादा 2016 से पहले के पाए जाते हैं। बाकी को तोडा जाता है। सर्वेक्षण सिर्फ और सिर्फ मज़दूर बस्तियों में होता है, नदी के अंदर बनी हुई एक भी होटल, रेस्टोरेंट या सरकारी बिल्डिंग पर कार्यवाही नहीं होती है।

16.12.2024 – NGT का नया आदेश आता है जिसमें वह कहते हैं कि केंद्र सरकार के 2016 के कुछ आदेश के साथ उनकी समझ में टकराव (विरोधाभास) होने के कारण 2018 का कानून लागु नहीं होगा, तो एक महीने के अंदर रिस्पना नदी पर बने सारे अतिक्रमण को हटाया जाये।  यह आदेश प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र के बाहर था क्योंकि विधान सभा या सांसद द्वारा पारित कानून को सिर्फ उच्चतम न्यायलय या उच्च न्यायलय द्वारा रद्द हो सकता है और वह भी ख़ास याचिका में। लेकिन सरकार इस आदेश को छुपाती है।

07.01.2025 – आदेश सार्वजनिक हो जाता है।

17.01.2025 – बवाल मचने के बाद मुख्यमंत्री बयान देते हैं कि जब तक भाजपा सरकार रहेगी तब तक एक भी मलिन बस्ती को नहीं उजाड़ा जाएगा।

10.02.2025 – उच्चतम न्यायालय सरकार के अपील पर NGT के आदेश पर तीन सप्ताह रोक लगा देता है। लेकिन गौरतलब है कि सरकार अपने ही 2018 वाले कानून को बचाने की कोशिश नहीं करती।  उसके बजाय उन्होंने इतना ही कहा कि बेदखली से पहले केंद्र सरकार की गंगा समिति की समीक्षा अनिवार्य है।  इस तकनीकी समस्या के आधार पर ही रोक लगाया जाता है।

12.02.2025 – उच्चतम न्यायालय के फैसले को संज्ञान में ले कर NGT अपने आदेश पर अनिश्चितकालीन रोक लगाता है और केंद्र सरकार को आदेश देती है कि वह समीक्षा करे।

प्रशासन जिन आदेशों का ज़िक्र कर रहा है – जैसे की कांठ बांग्ला को ले कर 17.03.2025 के आदेश और चन्दर रोड को ले कर 18.08.2025 के आदेश – इन आदेशों में भी स्पष्ट किया गया है कि बेदखली पर रोक जारी है।

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