
देवभूमि उत्तरकाशी, मां गंगा के तट पर स्थित, सदियों से ऋषि-मुनियों, तपस्वियों और संतों की साधना भूमि रही है। यहाँ भगवान परशुराम मंदिर, जो भैरव चौक में स्थित है, अत्यंत पूज्यस्थली मानी जाती है। यह मंदिर उत्तरकाशी की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है। बचपन में हमनें यहाँ पर अनेकों आयोजनो जैसे पांडव नृत्य, कुल देवता कंडर देवता की थाती और अनेक धार्मिक कृत्यों को होते हुए देखा है जो इसकी गौरवशाली परंपरा के साक्षी हैं। भक्तजन यहाँ माथा टेकने आते हैं, और अनेक ऋषि-मुनियों ने भी यहाँ अपनी साधना की है।
शांतिकुंज हरिद्वार के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा ने भी इस पावन भूमि पर अनेक बार कठोर तपस्या की। उन्होंने अपनी पुस्तक सुनसान के सहचर में उत्तरकाशी और गंगोत्री क्षेत्र में किए गए हिमालय यात्राओं और साधनाओं का विस्तार से उल्लेख किया है। योग निकेतन में गंगा तट पर रहकर उन्होंने वेदों का भाष्य किया और गायत्री मंत्र जप की साधना कर भारतीय आध्यात्मिक चेतना की धारा प्रवाहित की।
वर्ष 1971 में शांतिकुंज की स्थापना के बाद भी आचार्य श्रीराम शर्मा उत्तरकाशी में तप साधना के लिए आते रहे। 2026 में गायत्री परिवार अखंड ज्योति शताब्दी वर्ष और माता भगवती देवी शर्मा जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में जन-जागरण अभियान चला रहा है। उत्तरकाशी में इस अभियान को आगे बढ़ाने में पूर्व मुख्य ट्रस्टी अजय बडोला, यशपाल सिंह पयाल (मुख्य ट्रस्टी, श्रीराम ज्ञानशाला), तथा जिला समन्वयक समिति के सदस्य जय स्वरूप बहुगुणा, चन्द्र प्रकाश बहुगुणा, आनंद नौटियाल, नारायण सिंह पंवार, सुनील पंवार, मुरली मनोहर भट्ट, प्रेमलाल विजलावण, मदन पैनयुली, शांति प्रसाद बेलवाल, नरेश अग्रवाल, संजय अग्रवाल, शंभू प्रसाद नौटियाल, विष्णु सिंह चौहान, शिव प्रसाद मिश्रा आदि सक्रिय हैं।
महिला संयोजिका श्रीमती रेखा पयाल, संगीता पयाल, भावना अग्रवाल और अन्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से गायत्री मंत्र जप, दीप यज्ञ और भजन-कीर्तन गाँव-गाँव में किए जा रहे हैं। उद्देश्य है – भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाना। अखंड ज्योति मासिक पत्रिका और युग निर्माण योजना के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ सदस्यता अभियान भी चलाया जा रहा है।
परशुराम मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि उत्तरकाशी की सांस्कृतिक चेतना का भी प्रतीक है। आज भी यह मंदिर साधकों और श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का