सावन में शिवमय हुआ देश, लेकिन बदलते स्वरूप पर उठ रहे सवाल
सावन का महीना आते ही पूरा देश शिवमय हो जाता है। मंदिरों में हर-हर महादेव के जयकारे गूंजने लगते हैं और शिवालयों में जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की कतारें लग जाती हैं। गंगा तटों से लेकर गांव-कस्बों और शहरों तक कांवड़ियों की टोलियां नजर आती हैं। कंधे पर कांवड़, पवित्र गंगाजल और मन में भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा लेकर लाखों श्रद्धालु अनगिनत किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं। कांवड़ यात्रा करोड़ों लोगों के लिए आस्था, संकल्प, तपस्या और समर्पण का प्रतीक है।
लेकिन इसी पवित्र परंपरा के बीच एक सवाल लगातार सामने आ रहा है—क्या कांवड़ यात्रा की मूल भावना संयम, साधना, सेवा और शिवभक्ति से आगे बढ़कर शोर, शक्ति प्रदर्शन और दिखावे की प्रतिस्पर्धा में बदलती जा रही है?
कांवड़ यात्रा में तपस्या का महत्व
भगवान शिव की आराधना के लिए सावन का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु पवित्र नदियों से गंगाजल लेकर लंबी दूरी तय करते हैं और अंत में अपने आराध्य शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं। इस यात्रा में गर्मी, बारिश, भूख और थकान जैसी कठिनाइयों के बावजूद श्रद्धालु अपने संकल्प को पूरा करते हैं। यही तपस्या कांवड़ यात्रा की वास्तविक पहचान होनी चाहिए।
कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर भगवान परशुराम, श्रवण कुमार और लंकापति रावण से जुड़ी अलग-अलग धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं। समुद्र मंथन की नीलकंठ कथा भी भगवान शिव के जलाभिषेक की परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। इन कथाओं के ऐतिहासिक प्रमाणों को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन भगवान शिव की आराधना में जलाभिषेक और गंगाजल का धार्मिक महत्व बेहद गहरा है।
डीजे और शक्ति प्रदर्शन पर सवाल
बदलते दौर में कांवड़ यात्रा का एक दूसरा स्वरूप भी तेजी से सामने आया है। बड़े-बड़े डीजे, भारी साउंड सिस्टम, सजावटी वाहन, तेज आवाज में संगीत, बाइक रैलियां और सोशल मीडिया पर खुद को सबसे अलग दिखाने की होड़ अब यात्रा का हिस्सा दिखाई देती है।
सवाल यह है कि भगवान शिव की भक्ति के लिए इतना शोर जरूरी है क्या?
महादेव योग और ध्यान के प्रतीक हैं। उन्हें एक ऐसे तपस्वी के रूप में देखा जाता है, जो कैलाश पर समाधि में लीन रहते हैं। ऐसे में क्या उनकी भक्ति का सबसे प्रभावी माध्यम कानफोड़ू डीजे और अत्यधिक शोर हो सकता है?
भक्ति की शक्ति आवाज की ऊंचाई में नहीं, बल्कि भावना की गहराई में होती है।
आस्था के नाम पर अराजकता ठीक नहीं
कांवड़ यात्रा में शामिल करोड़ों श्रद्धालुओं को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा। बड़ी संख्या में कांवड़िए पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ यात्रा करते हैं। वे नशे से दूर रहते हैं, सात्विक जीवन जीते हैं और कठिन परिस्थितियों में पैदल यात्रा पूरी करते हैं। ऐसे श्रद्धालु वास्तव में इस परंपरा की गरिमा को आगे बढ़ाते हैं।
समस्या वहां शुरू होती है, जहां धार्मिक यात्रा के नाम पर अनुशासन पीछे छूट जाता है और हो-हल्ला भक्ति का हिस्सा बन जाता है। सड़क पर खतरनाक तरीके से वाहन चलाना, तेज रफ्तार, स्टंट, विवाद, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या कानून को चुनौती देने वाला व्यवहार किसी भी रूप में धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं हो सकता।
शंभू के नाम पर कानून तोड़ना महादेव की भक्ति नहीं है।
आम नागरिकों की परेशानी भी समझनी होगी
कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए प्रशासन को कई प्रमुख मार्गों पर यातायात डायवर्जन करना पड़ता है। लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए यह जरूरी भी है, लेकिन इसके साथ आम नागरिकों की परेशानियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अस्पताल जाने वाला मरीज, परीक्षा देने वाला छात्र, नौकरी पर जाने वाला कर्मचारी या रोज कमाकर परिवार चलाने वाला मजदूर भी इसी सड़क व्यवस्था का हिस्सा है। यदि कोई एंबुलेंस ट्रैफिक में फंस जाए या किसी मरीज को अस्पताल पहुंचने में देरी हो जाए तो इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन नागरिकों के अधिकार और उनकी सुविधाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। धार्मिक यात्रा का सम्मान इसलिए होता है क्योंकि उसमें आस्था होती है, लेकिन आस्था अराजकता का लाइसेंस नहीं हो सकती।
वहीं आमजन को भी कांवड़ यात्रा के दौरान संयम बरतना चाहिए और अनावश्यक टकराव से बचना चाहिए। जरूरत पड़े तो कुछ मिनट की देरी स्वीकार की जा सकती है। आखिर दुर्घटना से देर भली।
कैमरे के सामने बढ़ रही भक्ति?
सोशल मीडिया ने भी कांवड़ यात्रा के स्वरूप को प्रभावित किया है। बड़ी कांवड़, अनोखी सजावट, विशाल डीजे, बाइक रैली और कांवड़ियों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं।
सोशल मीडिया अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जब धार्मिक यात्रा का केंद्र भगवान से ज्यादा कैमरा बन जाए और श्रद्धा से ज्यादा इस बात की चिंता होने लगे कि वीडियो कितना वायरल होगा, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
आखिर महादेव को हमारे वीडियो की जरूरत है या हमारी भक्ति की?
कांवड़ जितनी बड़ी हो रही है, क्या मन में शिव के लिए श्रद्धा भी उतनी ही बड़ी हो रही है? डीजे की आवाज बढ़ने के साथ क्या भीतर का संयम भी बढ़ रहा है?
धार्मिक यात्रा का वास्तविक उद्देश्य बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि भीतर का परिवर्तन होना चाहिए।
यात्रा के बाद बदले व्यवहार तो सफल है कांवड़
अगर कांवड़ यात्रा से लौटने के बाद व्यक्ति अधिक विनम्र, संयमी, संवेदनशील और जिम्मेदार बनता है तो उसकी यात्रा वास्तव में सफल है।
लेकिन यदि यात्रा के बाद भी वही क्रोध, अहंकार, असंवेदनशीलता और गैर-जिम्मेदार व्यवहार कायम रहता है तो व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए—उसने कांवड़ में वास्तव में क्या उठाया था, गंगाजल या सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक?
प्रशासन की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। सुरक्षा, चिकित्सा, पेयजल, सफाई, यातायात प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं के साथ नियमों का पालन सुनिश्चित करना भी जरूरी है। धार्मिक आयोजन जितना बड़ा हो, व्यवस्था उतनी ही बड़ी होनी चाहिए, लेकिन नियम छोटे नहीं होने चाहिए।
सेवा भी है शिवभक्ति
कांवड़ यात्रा को केवल आलोचना की नजर से देखना भी उचित नहीं होगा। यह करोड़ों लोगों की आस्था का हिस्सा है। जगह-जगह स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन कांवड़ियों के लिए भोजन, पानी, चिकित्सा और विश्राम की व्यवस्था करते हैं। बिना किसी स्वार्थ के की जाने वाली यह सेवा कांवड़ यात्रा की सबसे खूबसूरत तस्वीरों में से एक है।
जरूरत यात्रा को खत्म करने की नहीं, बल्कि उसके बदलते स्वरूप में जुड़ी अनावश्यक चीजों को पहचानने की है।
कांवड़ के कंधे पर सिर्फ गंगाजल नहीं होता, बल्कि एक धार्मिक जिम्मेदारी भी होती है। रास्ते में किसी बुजुर्ग के लिए रास्ता छोड़ देना, एंबुलेंस को तुरंत रास्ता देना, सड़क पर कूड़ा न फेंकना, सार्वजनिक संपत्ति और पेड़-पौधों को नुकसान न पहुंचाना, ध्वनि की मर्यादा रखना और दूसरे नागरिकों की परेशानियों का ध्यान रखना भी शिवभक्ति है।
कांवड़ की पहचान डीजे नहीं, भक्ति हो
भगवान शिव को दिखावे की जरूरत नहीं है। वे भस्म रमाते हैं, कैलाश में रहते हैं, ध्यान करते हैं और विष पीकर संसार की रक्षा करने वाले नीलकंठ कहलाते हैं। उनकी भक्ति का सबसे बड़ा संदेश त्याग, संयम और धैर्य है।
कांवड़ यात्रा होनी चाहिए और पूरे उत्साह से होनी चाहिए। श्रद्धालु गंगाजल लेकर आएं, भगवान शिव का जलाभिषेक करें और अपनी आस्था पूरी श्रद्धा के साथ व्यक्त करें। लेकिन इस यात्रा की पहचान डीजे की आवाज नहीं, ‘बोल बम’ की भावना होनी चाहिए।
कांवड़ की पहचान उसकी ऊंचाई नहीं, उसे उठाने वाले भक्त की निष्ठा होनी चाहिए। यात्रा की पहचान सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन नहीं, सेवा और संयम होना चाहिए।
कांवड़ उठाना कठिन है, लेकिन उससे भी कठिन है अपने अहंकार को नीचे रखना। गंगाजल उठाना श्रद्धा है, लेकिन किसी दूसरे के अधिकार का सम्मान करना भी श्रद्धा है। ‘हर-हर महादेव’ बोलना भक्ति है, लेकिन किसी मरीज के लिए रास्ता छोड़ देना भी भक्ति है।
आखिर सवाल कांवड़ यात्रा से नहीं, हमसे है। क्या हम इस प्राचीन परंपरा को उसकी गरिमा के साथ आगे ले जाना चाहते हैं या इसे शोर और दिखावे की प्रतियोगिता बना देना चाहते हैं? क्या हमें भगवान शिव को प्रसन्न करना है या दुनिया को अपनी भक्ति दिखानी है?
जवाब हर श्रद्धालु को अपने भीतर तलाशना होगा। क्योंकि महादेव को हमारी आवाज की ऊंचाई नहीं, हमारे मन की सच्चाई चाहिए।
अभिषेक भारद्वाज, युवा लेखक एवं अधिवक्ता



