ऑनलाइन रंगमंच की संभावनाएं तलाशने की कोशिश पर सेमिनार

Ramesh Kuriyal
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फरीदाबाद। हरियाणा रंग उत्सव के तीसरे दिन शहर में सेमिनार का आयोजन किया गया। फोर्थ वाल प्रोडक्शंस और बैठानिया सेंटर के तत्वावधान में आयोजित इस सेमिनार का विषय ऑनलाइन रंगमंच की संभावनाएँ था। इस सेमिनार में मुख्य वक्ता के तौर पर एन0एस0डी0 के वरिष्ठ स्नातक और निर्देशक प्रो0 रवि चतुर्वेदी और विशिष्ट वक्ता के तौर पर श्रीश डोभाल ने अपने विचार रखे। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता रंगमंच प्रशिक्षक संजीव आहूजा ने की।

इस अवसर पर विशिष्ट वक्ता के तौर पर प्रो0 रवि चतुर्वेदी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि ऑनलाइन रंगमंच या आभासी रंगमंच जैसी कोई चीज़ ही नहीं होती। रंगमंच एक रचनात्मक प्रक्रिया है। रंगमंच बिना जीवन्त संप्रेषण के संभव ही नहीं है क्योंकि यह तो संवाद पर आधारित होता है। कोरोना काल में ऑनलाइन रंगमंच की संभावनाएँ तलाशने की कोशिश की गई लेकिन ऐसा कई बार हुआ जब सैंकड़ों सालों तक थियेटर बंद रहा। हजारों साल बाद 18 वीं शताब्दी में रंगमंच का पुनर्जागरण हुआ तो फिर कोरोना जैसी बिमारी भी कुछ नहीं कर सकती।ऑनलाइन के नाम पर थियेटर को मार दिया गया है, कला के क्षेत्र में सभी सरकारी योजनाएँ बंद कर दी गई हैं। कोरोना तो एक जाल है जबकि थियेटर तो एक सतत् प्रक्रिया है, इसलिए यह तो चलेगा और ऑनलाइन रंगमंच की कोई संभावना नहीं है। वहीं, विशिष्ट वक्ता के तौर पर श्रीश डोभाल ने इस विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि कोरोना काल में रंगकर्मियों का बहुत नुकसान हुआ। इस अवसर पर थियेटर न होने पर ऑनलाइन रंगमंच शुरू कर दिया गया। अपने घरों में, पुराने रखे हुए नाटकों को ऑनलाइन माध्यम से दिखाया जाने लगा, जिसे हज़ारों लोग देख लेते हैं। ऑनलाइन थियेटर रंगमंच तो नहीं है, यह मात्र प्रतिछवि है लेकिन यह जीवित रहेगा। कोरोना ने हमें लाखों लोग तक पहुँचने का माध्यम ने दिया है।

इस सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए रंगमंच प्रशिक्षक संजीव आहूजा ने कहा कि रंगमंच ऑलाइन हो तो सकता है, पर वह रंगमंच की रचनात्मक प्रक्रिया नहीं कही जा सकती। इस सेमिनार में शामिल लोगों ने वक्ताओं के समक्ष अपने प्रश्न भी रखे।

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