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टीएमयू की वैश्विक एफडीपी में सतत विकास लक्ष्यों पर गहन मंथन

Ramesh Kuriyal
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तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज की ओर से छह दिनी अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन फैकल्टी डवलपमेंट प्रोग्राम- एफडीपी में संयुक्त राष्ट्र के सभी 17 सतत विकास लक्ष्यों की व्यावहारिक उपयोगिता, उनके अंतर्संबंधों और उच्च शिक्षा में उनके क्रियान्वयन पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ। एफडीपी की थीम मैपिंग द 17 सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स थ्रू इंटरडिसिप्लिनरी फैकल्टी एंगेजमेंट रही। यूनिवर्सिटी पुत्रा मलेशिया के डॉ. वान जुहैनिस साद ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा- एसडीजी-4 पर बोलते हुए मूल्य-आधारित शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, शिक्षा में केवल कौशल देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि छात्रों में नैतिक मूल्य और पर्यावरणीय संवेदनशीलता विकसित करना आवश्यक है।यूनिवर्सिटी ऑफ द फिलीपींस मनीला के डॉ. मा. टेरेसा गुआजोन-डी गुजमैन ने जलवायु कार्रवाई- एसडीजी-13 पर अपने अनुभव साझा करते हुए जलवायु परिवर्तन के सामाजिक, कृषि एवम् आर्थिक प्रभावों को गहनता से समझाया। उन्होंने यूनिवर्सिटीज़ कोे साक्ष्य-आधारित नीतियों और नवाचार का केंद्र बनाने का आह्वान किया। टीएमयू लॉ कॉलेज के डीन प्रो. हरबंश दीक्षित ने एसडीजी-16 के तहत शांति, न्याय, सशक्त संस्थानों, पारदर्शिता और संस्थागत उत्तरदायित्व की भूमिका समझाई। उन्होंने कहा, न्यायपूर्ण और उत्तरदायी संस्थाओं के बिना सतत विकास के अन्य लक्ष्यों की स्थायी उपलब्धि संभव नहीं है।

आईक्यूएसी के निदेशक डॉ. निशीथ मिश्रा ने संस्थागत सहयोग, विभिन्न विभागों और यूनिवर्सिटीज़ के बीच साझेदारी और एसडीजी के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए संयुक्त प्रयासों पर अपने विचार साझा किए। कॉलेज ऑफ नर्सिंग की डीन प्रो. एसपी सुभाषिनी ने स्वास्थ्य, स्वच्छता, स्वच्छ जल, जन-जागरूकता और टिकाऊ यूनिवर्सिटी कैंपस की आवश्यकता पर बोलते हुए कहा, सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता मानव स्वास्थ्य और सामाजिक विकास की बुनियादी आवश्यकता है। रिसर्च एंड डवलपमेंट के एसोसिएट डीन डॉ. अनुराग वर्मा ने अनुसंधान संस्कृति, नवाचार के मार्ग और प्रौद्योगिकी विकास पर विचार रखे। उन्होंने कहा, यूनिवर्सिटीज़ में शोध को प्रयोगशालाओं तक सीमित न रखते हुए सामाजिक समस्याओं के समाधान और तकनीकी नवाचार से जोड़ा जाना चाहिए। डिपार्टमेंट ऑफ फिजियोथेरेपी की एचओडी प्रो. शिवानी एम. कौल ने महिला सशक्तीकरण एवम् समान अवसरों पर विस्तार से चर्चा की। कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन के प्रिंसिपल प्रो. मनु मिश्रा ने शारीरिक-मानसिक कल्याण पर जोर दिया। एग्रीकल्चर कॉलेज के डीन एवम् कार्यक्रम आयोजक प्रो. प्रवीन कुमार जैन ने कहा, अब स्टुडेंट्स में वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टि विकसित करनी होगी। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र का सीधा संबंध खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु अनुकूलन, जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका से है, इसलिए कृषि शिक्षा में एसडीजी का समावेश भविष्य की मुख्य आवश्यकता है।

कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज़ के डॉ. गणेश दत्त भट्ट ने जलीय जैव विविधता और डॉ. लक्ष्मीकांत त्रिपाठी ने पोषण-संवेदी कृषि और टिकाऊ खाद्य सुरक्षा पर व्याख्यान दिया। डॉ. आशुतोष अवस्थी ने जैव उर्वरकों, डॉ. सुषमा सिंह ने हरित परिसरों और प्रो. सुशील कुमार सिंह ने सामाजिक समावेशन पर अनुभव साझा किए। डॉ. डी.पी. सिंह ने स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर और डॉ. साधना सिंह ने सामुदायिक स्वास्थ्य और प्रो. अमित कंसल ने युवाओं में जॉब-सीकर के बजाए जॉब-क्रिएटर बनने हेतु उद्यमशील सोच पर प्रकाश डाला। डॉ. चारु बिष्ट ने बताया कि एसडीजी के 17 लक्ष्य अलग-अलग विषय न होकर एक-दूसरे से जुड़ी जिम्मेदारियां हैं। खाद्य सुरक्षा पर काम करते समय जल, भूमि, जलवायु परिवर्तन और गरीबी जैसे घटकों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एफडीपी में पांच मुख्य बिन्दुओं- पाठ्यक्रम में एसडीजी केस-स्टडीज का समावेश, स्थानीय समस्याओं पर अंतर्विषयी शोध का विकास, संस्थागत एसडीजी योगदान का मापने योग्य दस्तावेजीकरण, अंतर-विभागीय एवम् उद्योग-अकादमिक साझेदार और संकाय ज्ञान का व्यावहारिक एवम् सामुदायिक उपयोग को लागू करने पर जोर दिया गया।

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