देहरादून। सामाजिक उद्यमिता में सफलता के लिए केवल नए विचार और जुनून पर्याप्त नहीं हैं। उद्यम को टिकाऊ बनाने के लिए समुदाय को लाभार्थी नहीं, बल्कि बराबर का भागीदार मानना, वित्तीय आत्मनिर्भरता, अनुशासन और असफलताओं से सीखने का धैर्य जरूरी है। यह बात क्राफ्टिज़ेन फाउंडेशन की संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी मयूरा बालासुब्रमणियन ने शुक्रवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में आयोजित विशेष संवाद में कही।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, क्राफ्टिज़ेन फाउंडेशन और साहस फाउंडेशन इन्क्लूसिव रिसोर्स सेंटर के संयुक्त तत्वावधान में ‘जब आप एक सामाजिक उद्यमी हैं या सामाजिक उद्यमी बनने के बारे में सोच रहे हैं, तब आपको क्या-क्या नहीं करना चाहिए’ विषय पर संवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मयूरा बालासुब्रमणियन के साथ साहस फाउंडेशन इन्क्लूसिव रिसोर्स सेंटर के संस्थापक शहाब नक़वी ने संवाद किया।
मयूरा बालासुब्रमणियन ने कहा कि सामाजिक उद्यमिता पर आमतौर पर यह बताया जाता है कि क्या करना चाहिए, जबकि वास्तविक सीख कई बार उन गलतियों से मिलती है, जो उद्यम की यात्रा के दौरान होती हैं। अपने करीब दो दशक के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि क्राफ्टिज़ेन फाउंडेशन देशभर के शिल्पकारों, विशेषकर महिला शिल्पकारों और हाशिये के समुदायों के पारंपरिक कौशल को समकालीन डिजाइन और बाजार से जोड़ने का काम कर रहा है।
उन्होंने कहा कि केवल दया या सहानुभूति के आधार पर कोई टिकाऊ सामाजिक उद्यम खड़ा नहीं किया जा सकता। शिल्पकारों को लाभार्थी के बजाय बराबर का भागीदार और उनके ज्ञान एवं कौशल का स्वामी मानना जरूरी है। नए उद्यमियों में हर समस्या का समाधान स्वयं करने की प्रवृत्ति होती है, जबकि कई परिस्थितियों में ‘न’ कहना और समुदाय को स्वयं निर्णय लेने का अवसर देना ही वास्तविक सशक्तीकरण का रास्ता बनता है।
फंडिंग की दौड़ और जल्दबाजी में विस्तार से बचें
मयूरा ने फंडिंग के पीछे लगातार भागने, आवश्यकता से अधिक तेजी से उद्यम का विस्तार करने और बाजार के दबाव में परंपरा व गुणवत्ता से समझौता करने को सामाजिक उद्यमिता की प्रमुख चुनौतियां बताया। उन्होंने कहा कि जुनून के साथ वित्तीय अनुशासन, आत्मनिर्भरता और असफलताओं से सीखने की क्षमता किसी भी सामाजिक उद्यम को लंबे समय तक टिकाए रखने के लिए जरूरी है।
शहाब नक़वी ने संवाद को उत्तराखंड और देहरादून के संदर्भ से जोड़ते हुए कहा कि पहाड़ में सामाजिक उद्यमिता की व्यापक संभावनाएं हैं। स्थानीय हस्तशिल्प, जैविक उत्पाद, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समावेशी शिक्षा जैसे क्षेत्रों में नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं। इसके लिए युवाओं को तात्कालिक परिणामों के बजाय दीर्घकालिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ना होगा।
उन्होंने कहा कि समावेशी विकास तभी सार्थक है, जब दिव्यांगजन, महिलाएं और वंचित समुदाय विकास की प्रक्रिया के किनारे नहीं, बल्कि उसके केंद्र में हों। साहस फाउंडेशन इन्क्लूसिव रिसोर्स सेंटर इसी दृष्टिकोण के साथ कार्य कर रहा है।
स्थानीय उत्पादों को बाजार से जोड़ने पर सवाल
संवाद के बाद आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने सामाजिक उद्यम शुरू करने, सीमित संसाधनों में काम करने और पहाड़ के स्थानीय उत्पादों को शहरी बाजारों से जोड़ने से जुड़े सवाल पूछे। दोनों वक्ताओं ने अपने व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर सवालों के जवाब दिए।
कार्यक्रम में शिल्प संगठनों से जुड़े लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शहर के प्रबुद्ध नागरिकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने अतिथियों का स्वागत किया और दोनों वक्ताओं सहित सहयोगी संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त किया।



