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ब्रिक्स समझौतों से उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों के विकास को मिलेगी नई रफ्तार

Sarthak Prayash Admin
3 Min Read

देहरादून, हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) के माध्यम से बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण को लेकर कई महत्वपूर्ण समझौते किए गए हैं। इन वैश्विक समझौतों का सीधा लाभ उत्तराखंड समेत देश के अन्य सीमावर्ती पहाड़ी राज्यों को मिलने की संभावना जताई जा रही है। पर्यावरणीय सुरक्षा के पुख्ता उपायों और स्थानीय कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार मिलने से पर्वतीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को नया आयाम मिलेगा।

आपदा प्रबंधन और अर्ली वार्निंग सिस्टम पर सहमति

सम्मेलन में जारी ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ के तहत आपदा प्रबंधन के लिए सदस्य देशों के बीच ‘पूर्व चेतावनी तंत्र’ (Early Warning System) साझा करने पर सर्वसम्मति बनी है। भारत के कई संवेदनशील पर्वतीय राज्य चीन की सीमा से सटे हैं, जहां की नदियां और जल तंत्र सीधे तौर पर निचले इलाकों को प्रभावित करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि चीन के साथ जल विज्ञान संबंधी आंकड़ों और पूर्व चेतावनियों का रियल-टाइम आदान-प्रदान सुचारू होता है, तो भूस्खलन और बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान होने वाले जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।

जोशीमठ जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को मिलेगा तकनीकी लाभ

पहाड़ी राज्यों के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में चीन की ‘जलवायु-अनुकूल शहरी तंत्र’ (Climate-Resilient Infrastructure Design) तकनीक मददगार साबित हो सकती है। इसके अलावा, रूस और चीन के पास उच्च-हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर मॉनिटरिंग का व्यापक अनुभव है। इस तकनीकी सहयोग से उत्तराखंड के जोशीमठ जैसे भू-धंसाव और ग्लेशियर की दृष्टि से संवेदनशील स्थलों की निरंतर और सटीक निगरानी संभव हो सकेगी।

पारंपरिक फसलों को मिलेगा वैश्विक बाजार, किसानों की बढ़ेगी आय

ब्रिक्स देशों के बीच कृषि क्षेत्र में उत्कृष्टता केंद्र (Centers of Excellence in Agriculture) की स्थापना और खाद्यान्न के व्यापार को बढ़ावा देने का निर्णय लिया गया है। इस कदम से उत्तराखंड के पारंपरिक और पोषक तत्वों से भरपूर कृषि उत्पादों—जैसे मंडुवा, झंगोरा और स्थानीय राजमा—को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। वैश्विक मंच पर मांग बढ़ने से स्थानीय किसानों को उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा और पलायन जैसी समस्याओं पर भी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।

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