उत्तराखंडशिक्षा

*मज़दूरों के बच्चे डीजीपी के हाथ हुए पुरस्कृत

सीनियर वर्ग में प्रीती मौर्या और जूनियर वर्ग में अनुकुमारीप्रथम रहीं

 

देहरादून। ख़ुशी राम पब्लिक लाइब्रेरी में “हम हैं महिला!* ड्राइंग प्रेतयोगिता के फाइनल में सीनियर वर्ग में प्रीती मौर्या और जूनियर वर्ग में अनुकुमारीप्रथम रहीं। उन्हें पंद्रह हजार का इनाम मिला।

“हम हैं महिला!* ड्राइंग प्रेतयोगिता के सीनियर वर्ग में प्रीती मौर्या प्रथम ज्योति राजभर द्वितीय और सुहानी मिश्रा तृतीय रहीं। जबकि जूनियर वर्ग में अनुकुमारी, नेहा राजभर, और करिश्मा ने बाजी मारी। दोनों वर्गों में फाइनल राउंड में प्रथम विजेता को ₹15000 द्वितीय को ₹11000 व तृतीय विजेता को ₹7500 की धनराशि , ट्रॉफी एवं सर्टिफिकेट भी पुरस्कार के रूप में डीजीपी अशोक कुमार IPS के हाथ से दिया गया था। वरिष्ठ आंदोलनकारी गीता गैरोला और उमा भट्ट की उपस्थिति में प्रतियोगिता के 70 से ज्यादा महिला संयोजिकाओं को ट्रॉफी दे कर सम्मानित किया गया। इसके साथ साथ 130 और बच्चों को भी 500 रुपये की धनराशि और ट्रॉफी भी दिया गया (ये बच्चे अपना क्षेत्र में टॉप दस बच्चों में से रैंक पाए थे)।

पिछले डेढ़ महीने से देहरादून शहर के विभिन्न मोहल्लों में यह प्रतियोगिता मज़दूरों के बच्चों के बीच करवाया जा रहा था। सैकड़ों गरीब बच्चों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिए हैं। महिला मज़दूरों ने खुद इस प्रतियोगिता का पूरा आयोजन किया। हर क्षेत्र के प्रतिभागियों में से टॉप तीन बच्चों के बीच आज फाइनल करवाया गया था।

 

कम्पटीशन की पहली चरण में जज के रूप में वरिष्ठ कवि राजेश सकलानी, वेल्हम्स गर्ल्स स्कूल के वरिष्ठ आर्ट टीचर सुकन्या चटर्जी और दीपशिखा , होप टाउन गर्ल्स स्कूल के हेड आर्ट टीचर पिंकी भठिया , वरिष्ठ शिक्षाविद चित्रा गुप्ता और वरिष्ठ समाज सेविका अनुराधा संगल ने बच्चों के ड्राइंग की मार्किंग किया। फाइनल में वरिष्ठ कलाकार प्रमोद सहाय , गीता गैरोला और भारत ज्ञान विज्ञानं समिति के वरिष्ठ आंदोलनकारी उमा भट्ट ने मार्किंगकी।
आयोजकों ने बताया कि हमारा राज्य और देश में मज़दूरों के संघर्षों पर कम ही चर्चा ही होती है। पुरुष मज़दूरों की चुनौतियों पर कभी कभी मीडिया में आने की सम्भावना होती है लेकिन महिला मज़दूरों की चुनौतियों पर बिलकुल सन्नाटा रहता है। उनकी कमर तोड़ मेहनत की कोई इज़्ज़त नहीं होती – न समाज में, न उनके मालिकों की नज़रों में और कभी कभी न उनके खुद के परिवार में। इसलिए चेतना आंदोलन की और से यह नया प्रयास किया गया था।

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