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उत्तराखंड के 1700 से अधिक गांव हुए वीरान, कृषि और जलस्रोतों पर गहराया संकट

Ramesh Kuriyal
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देहरादून। मध्य हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव अब स्पष्ट और चिंताजनक रूप में सामने आने लगे हैं। बदलती जलवायु न केवल पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित कर रही है, बल्कि इसका असर कृषि, जलस्रोतों, जैव विविधता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर रूप से दिखाई दे रहा है। इस कारण उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन तेज हुआ है और हजारों गांव वीरान हो चुके हैं।

यह तथ्य मूल रूप से चमोली जिले के निवासी एवं मिजोरम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विश्वंभर प्रसाद सती के हालिया अध्ययन में सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि एवं बागवानी उत्पादन में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है और रोजगार के अवसर कम होने के कारण बड़ी संख्या में लोग गांव छोड़ने को मजबूर हुए हैं।

अध्ययन के मुताबिक उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों से 20 प्रतिशत से अधिक आबादी पलायन कर चुकी है, जबकि राज्य के 1,700 से अधिक गांव आज वीरान या “भुतहा गांव” बन चुके हैं। इसके साथ ही पारंपरिक प्राकृतिक जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं। भूमि के बंजर होने से वर्षा जल का भूगर्भ में समावेश कम हो रहा है, जिससे भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और कई इलाकों में पेयजल संकट गहराता जा रहा है।

पारंपरिक फसलें संकट में, सेब की खेती खिसकी ऊंचाई की ओर

प्रो. सती के अनुसार जलवायु परिवर्तन का सीधा असर खेती पर भी पड़ा है। कई पारंपरिक फसलें विलुप्त हो चुकी हैं, जबकि अनेक फसलें विलुप्ति के कगार पर हैं। पहले जिन निचले पर्वतीय क्षेत्रों में सेब और खट्टे फलों की खेती होती थी, वहां अब उत्पादन लगभग समाप्त हो चुका है। वहीं मोटे अनाज की खेती में भी लगातार गिरावट दर्ज की गई है, जिससे भविष्य में खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ने की आशंका है।

चीड़ का बढ़ता विस्तार, बांज के जंगल सिमट रहे

अध्ययन में वनस्पति संरचना में भी बड़े बदलाव की ओर संकेत किया गया है। बढ़ते तापमान के कारण चीड़ के जंगल तेजी से ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर फैल रहे हैं, जबकि पारंपरिक बांज के वन लगातार सिकुड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव हिमालय की जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन के लिए गंभीर खतरा है।

हिमनद पिघले, नदियों के प्रवाह पर असर

रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन दशकों में हिमावरण में उल्लेखनीय कमी आई है। हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों के प्राकृतिक प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। विशेष रूप से अलकनंदा और भागीरथी घाटियों में यह स्थिति अधिक चिंताजनक बताई गई है।

अनिश्चित बारिश से बढ़ा आपदाओं का खतरा

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि वर्षा के पैटर्न में बदलाव और चरम मौसमी घटनाओं में वृद्धि के कारण प्राकृतिक आपदाओं का खतरा कई गुना बढ़ गया है। बादल फटना, भूस्खलन, बाढ़ और हिमनद झील फटने (जीएलओएफ) जैसी घटनाएं अब पहले की तुलना में अधिक देखने को मिल रही हैं। वर्ष 2020 से 2022 के बीच उत्तराखंड में 200 से अधिक प्राकृतिक आपदाएं दर्ज की गईं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं। इसके अलावा वनाग्नि की घटनाओं में भी लगातार वृद्धि हो रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो चुका है। यदि समय रहते प्रभावी संरक्षण और अनुकूलन संबंधी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में इसके सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय दुष्परिणाम और अधिक गंभीर हो सकते हैं।

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