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टीएमयू में सिद्ध भगवान के 256 गुणों का गुणगान

समुच्चय पूजन,समुच्चय चौबीसी, जिन पूजन, नंदीश्वर द्वीप पूजन में भोपाल से आई म्यूजिक पार्टी ने उत्कृष्ट संगीत और भक्ति गीतों के रस में डुबोकर श्रद्धालुओं को पूजा के पद्यों से कराया आध्यात्मिक उन्नयन

मुरादाबाद। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी में 256 गुण संयुक्त श्री सिद्ध परमेष्ठी की भक्ति पूर्वक आराधना की गई। सिद्ध चक्र महामंडल विधान के छठें दिन अर्घ्यों में ज्ञानावरणी आठ, उनकी उत्तर प्रकृतियाँ एक सौ अड़तालिस आदि कर्मों का अभाव कर सिद्ध हुए भगवान का गुणानुवाद किया जा रहा है। इनमें से पहले से लेकर छठवें पद्य पर्यन्त; छह पद्यों द्वारा ज्ञानावरण और उसकी पांचों प्रकृतियों के विनाशक सिद्ध भगवान का गुणगान किया गया है। समुच्चय पूजन,समुच्चय चौबीसी, जिन पूजन, नंदीश्वर द्वीप पूजन में भोपाल से आई संजय एंड पार्टी ने उत्कृष्ट संगीत और भक्ति गीतों के रस में डुबोकर श्रद्धालुओं को पूजा के पद्यों से आध्यात्मिक उन्नयन कराया।विधान में तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति श्री सुरेश जैन के संग-संग फर्स्ट लेडी श्रीमती वीना जैन, ग्रुप वाइस चेयरमैन श्री मनीष जैन, श्रीमती ऋचा जैन की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। इस विशेष पूजा में यूपी के संग-संग महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, असम आदि से आए श्रावक-श्राविकाएं धर्म लाभ कमा रहे हैं।
भोपाल से आई संजय एंड पार्टी ने सुरमय भक्ति गीतों ने सभी भक्तों को सिद्ध प्रभु की भक्ति में तल्लीन कर दिया। शरण जो आते है, वो भव तर जाते है , अंतर में जाने का मार्ग ध्यान है,आई – आई प्रभु तेरी याद आयी,लाएगी – लाएगी भक्ति हमारी रंग लाएगी,तुम देर न करना आने में, भोपाल से आया हूँ तेरे दर्शन करने आया हूँ, पहली- पहली बार देखा ऐसा पहली बार, दिया मेरा कौन जलावे बाबा तेरे बिना, एक बार आओ महावीरा मेरे आंगन में,डोला रे डोला रे,चंदा – चंदा सोनागिर के चंदा एक बार जो दर्शन कर ले…श्रद्धालुओं को झूमकर नाचने को मजबूर कर दिया। विभिन्न राज्यों में लोकप्रिय जैन धर्म के भजनों के साथ जब पूजन किया गया तो श्रद्धालुओं ने भक्ति के समुन्दर में डूबकर, हवा में पंछी की तरह अपने हाथों को फैलाकर, झूम-झूमकर भक्ति नृत्य किए।
विधानाचार्य ने नारियल को श्रीफल कहने पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्रीफल चढ़ाने से अष्ट द्रव्य चढ़ाने का पुण्य मिलता है। सिद्ध भक्ति रचना को उत्तर की दिशा में मुँहकर और पूर्ण शुद्धता के साथ वाचन करने से कार्य सिद्धि होती है। पांच इन्द्रियों का जीवन चक्र और जीवों में एक खास क्रम विहित है। औदारिक शरीर श्रेष्ठ होता है, क्योंकि वह पुण्य कार्यो में सलंग्न रहता है।उन्होंने संहनन के भी प्रकार बताए। छह संहननों से रहित सिद्ध भगवान की आराधना की जा रही है, जिसे मोक्ष जाना है उसे संहनन रहित होना पड़ेगा।अयशकीर्ति और ‘निर्माण नाम कार्य’ के बंध से बचना हो तो-जो धर्म का काम करे, उसकी मन से प्रशंसा करो। दानंतराय- दान न दे पाए सोचते रह जाए,उसे इस तरह का कर्म बंध होता है। दो बातों का हमेशा ध्यान रखना- अशुद्ध अवस्था में मुनि राज को आहार मत देना और निर्माल्य कभी मत खाना/रखना। सबकुछ है, पर भोग नहीं सकते,खा नहीं सकते हैं, यह भोगन्तराय और लाभांतराय कर्म बंध हैं। अतिथि को प्रसन्न होकर खिलाओ, जो भी आपके पास है भले ही वो रुख सूखा क्यों न हो तो आप लाभांतराय और भोगन्तराय कर्म के बंद से मुक्त रहेंगे। यही हमें विधान के पद्य इस तरह के बंधों से मुक्त होने और सिद्धत्व की ओर ले जाने की ओर सिद्धों की आराधना करते है। पद्यानुवाद के दौरान यह भी बताया कि सिद्ध भगवान हम आपके गुणों का बखान नहीं कर सकते हैं, हम तो सिर्फ आपके विभिन्न पर्यायों के गुणों की बखान करते है। यह उसी तरह है, जैसे बालक जल में विद्यमान चंद्रमा के बिम्ब प्रतिबिम्ब को अपने हाथ में पकड़ने की कोशिश करता है। वैसे ही मैं भी सब भक्तिवश गुणगान कर रहा हूँ। ऐसा विधान के अर्घ्यों और श्लोको के अर्थ वर्णन के दौरान विधानाचार्य ने बताया।
श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में श्री मनोज जैन, श्रीमती नीलिमा जैन, श्रीमती नीलम जैन, प्रो. रवि जैन, डाॅ. अर्चना जैन, श्री अतुल जैन, श्री नीरज जैन, डाॅ. सैफाली जैन, रानी जैन, अहिंसा जैन, स्वाति जैन, श्री आशीष सिंघई, डाॅ. विनोद जैन आदि भी मौजूद रहे।मुरादाबाद जैन समाज के परिवार भी इस विधान में हिस्सा लेकर पुण्यार्जन कर रहे हैं, जिसमें महानगर जैन सभा के अध्यक्ष श्री अनिल जैन, महिला जैन मिलन की पूर्व अध्यक्षा श्रीमती निधि जैन, श्री अतुल जैन, श्री राजकुमार जैन, श्री एनके जैन आदि गणमान्य नागरिक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। मुरादाबाद जैन समाज के गणमान्य नागरिकों और जैन समाज के सम्मानीय श्रद्धालुओं ने परिवार के साथ रिद्धि- सिद्धि भवन पहुंकर धर्म लाभ लिया और इस सुरमयी आद्यात्मिक वातावरण में अपने आपको झूमने और भक्तों में डूबकर नाचने से नहीं रोक सके। विधान में शामिल श्रावक – श्राविकाओं ने नियमबद्ध होकर जाप पूर्ण किए और पुण्य लाभ प्राप्त किया। सांध्यकालीन प्रवचन में आरती के पश्चात प्रतिष्ठाचार्य श्री ऋषभ शास्त्री ने सिद्धों के 256 गुणों की जीवन में भूमिका और सिद्धचक्र महामंडल विधान के इन अर्घो के महात्म्य को समझाया। विधान का सम्पूर्ण संचालन और व्यवस्थापन यूनिवर्सिटी ग्रुप वाइस चेयरमैन की अर्धांगिनी श्रीमती ऋचा जैन और टीम के निर्देशन में हो रहा है। विधान में मोक्ष प्राप्ति की कामना लिए श्रावक-श्राविकाओं के साथ छात्र – छात्राएं और जैन फैकल्टीज भी उत्साहपूर्वक सहभागिता कर रहे हैं।

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