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छोटा राज्य – बड़ा घोटाला, कैग की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

देहरादून। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने उत्तराखंड में सरकारी योजनाओं और विभागों में हुई गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की पोल खोल दी है। उत्तराखंड विधानसभा में पेश की गई इस रिपोर्ट में वर्ष 2018 से 2024 के बीच विभिन्न परियोजनाओं की जांच के दौरान करोड़ों रुपये के दुरुपयोग और प्रशासनिक लापरवाही सामने आई है।

रिपोर्ट के अनुसार करीब 634 करोड़ रुपये के कार्यों की जांच में लगभग 75 करोड़ रुपये की सीधी वित्तीय अनियमितता पाई गई है। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं से लेकर बिजली, परिवहन, स्वास्थ्य और ग्रामीण रोजगार योजनाओं तक कई मामलों में नियमों की अनदेखी और संसाधनों के दुरुपयोग की बात सामने आई है।

स्मार्ट सिटी परियोजना में कई खामियां

देहरादून की देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना में भी भारी अनियमितताएं सामने आई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 4.85 करोड़ रुपये की लागत से खरीदे गए ई-रिक्शा आज बेकार पड़े हैं, जबकि ई-बस चार्जिंग स्टेशन बनाए गए लेकिन उनका उपयोग नहीं हुआ।

सेंसर आधारित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम पर 4.55 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन इसका कोई ठोस लाभ जनता को नहीं मिला। ठेकेदार के साथ अनुबंध समाप्त होने के बाद भी करीब 19 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान वापस नहीं लिया गया।

इसके अलावा 2.62 करोड़ रुपये की लागत से लगाए गए 50 पवन सेंसर राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए। धूल लाइब्रेरी परियोजना में जीएसटी के दोहरे दावों और अधिक दरों के कारण 34.70 लाख रुपये का अतिरिक्त भुगतान किया गया।

स्मार्ट स्कूल परियोजना में 5.91 करोड़ रुपये खर्च कर तीन स्कूलों में कंप्यूटर लैब और स्मार्ट बोर्ड लगाए गए, लेकिन बिजली बिल का भुगतान न होने के कारण उपकरण इस्तेमाल में नहीं आ सके और बेकार पड़े रहे।

परेड ग्राउंड में दो वीआईपी मंच

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि देहरादून के परेड ग्राउंड में पहले से मौजूद करीब 31 लाख रुपये के वीआईपी मंच के बावजूद 84.10 लाख रुपये खर्च कर नया मंच बना दिया गया, जिस पर भी सवाल उठे हैं।

बिजली वितरण में भारी नुकसान

उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPCL) के क्षेत्रों में बिजली वितरण व्यवस्था में भी गंभीर कमियां सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार लाइन लॉस के कारण 900.64 मिलियन यूनिट बिजली का नुकसान हुआ।

इसके अलावा 1.13 लाख उपभोक्ताओं को बिना मीटर रीडिंग के करीब 385 करोड़ रुपये के बिल जारी कर दिए गए, जिससे बिलिंग और निगरानी प्रणाली पर सवाल खड़े हुए हैं।

सरकारी कंपनियों में निवेश पर नहीं मिला लाभ

CAG रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार ने 32 सार्वजनिक उपक्रमों और 28 सरकारी कंपनियों में कुल 8903 करोड़ रुपये का निवेश किया, लेकिन इनमें से केवल दो निगमों को छोड़कर बाकी से सरकार को कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ।

लोक निर्माण, सिंचाई और ग्रामीण निर्माण विभागों के ठेकेदारों से पूरी रॉयल्टी न वसूलने के कारण करीब 252 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

कोविड काल में महंगी खरीद

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य विभाग ने एंबुलेंस और अन्य उपकरण बाजार दर से अधिक कीमत पर खरीदे, जिससे करीब 87 लाख रुपये का अतिरिक्त खर्च हुआ। CAG ने टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं।

कुंभ और नमामि गंगे पर भी सवाल

कुंभ मेला 2021 के लिए जारी 806 करोड़ रुपये के बजट में भी अनियमितताओं के संकेत मिले हैं। रिपोर्ट के अनुसार कुछ कार्य ऐसे दिखाए गए जिनका स्पष्ट लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है।

वहीं नमामि गंगे परियोजना पर भारी खर्च के बावजूद गंगा की सफाई को लेकर अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए हैं।

परिवहन विभाग में टैक्स बकाया

परिवहन विभाग में 65 हजार से अधिक वाहन टैक्स नहीं दे रहे हैं, जिन पर करीब 361 करोड़ रुपये का टैक्स बकाया है। कई वाहनों ने दस साल से टैक्स जमा नहीं किया, लेकिन विभाग ने इनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

मनरेगा में भी गड़बड़ी

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के क्रियान्वयन में भी कई खामियां सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में केवल 1 से 6 प्रतिशत परिवारों को ही साल में 100 दिन का रोजगार मिल पाया, जबकि कई जगह मजदूरी भुगतान में देरी और रिकॉर्ड में गड़बड़ियां भी पाई गई हैं।

CAG की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद राज्य की कई प्रमुख योजनाओं और विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राजनीतिक हलकों में भी इसे लेकर चर्चा तेज हो गई है और मामले की विस्तृत जांच की मांग उठने लगी है।

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