गुरु-शिष्य परम्परा, अनुभवात्मक अधिगम और सामाजिक उत्तरदायित्व यूनिवर्सिटीज़ के लिए अति महत्वपूर्णः डॉ. स्वाति राणे
आईकेएस केंद्र की भारतीय ज्ञान प्रणाली के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिकाः डॉ. अमित कंसल
प्रो. शिवानी एम. कौल कहा, कॉन्क्लेव गुरु-शिष्य संबंध और नैतिक मूल्यों को शिक्षा से जोड़ने में मील का पत्थर
भारतीय ज्ञान प्रणाली के मूल सिद्धांत समकालीन शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा प्रदान करनाः डॉ. अलका अग्रवाल
उत्तराखण्ड संस्कृत यूनिवर्सिटी, हरिद्वार के कुलपति प्रो. दिनेश चन्द्र शास्त्री ने कहा, द्वापर युग में गुरुकुल व्यवस्था केवल ज्ञानार्जन का ही माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, नैतिकता, अनुशासन और राष्ट्रधर्म की आधारशिला भी थी। उन्होंने महर्षि वेदव्यास, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, महर्षि संदीपनी आदि की शिक्षण परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा, उस समय शिक्षा सभी योग्य विद्यार्थियों के लिए समान रूप से उपलब्ध थी। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के जरिए भारतीय ज्ञान परम्परा के पुनर्स्थापन की आवश्यकता पर बल दिया। प्रो. शास्त्री तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के भारतीय ज्ञान परम्परा-आईकेएस केंद्र के तत्वावधान में 15वें राष्ट्रीय ऑनलाइन कॉन्क्लेव में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। कॉन्क्लेव की थीम द्वापर युगः ज्ञान का संस्थानीकरण और राजकीय विद्यापीठों की परंपरा रही। इससे पूर्व मां सरस्वती की वंदना के संग कॉन्क्लेव का शंखनाद हुआ। समापन राष्ट्रगान के संग हुआ। सेवाशक्ति हेल्थकेयर, मुंबई की संस्थापक एवम् मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. स्वाति राणे ने आधुनिक उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान प्रणाली की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा, वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को केवल रोजगारोन्मुखी नहीं, बल्कि मूल्यपरक, बहुविषयक, अनुभवात्मक और चरित्र-निर्माण आधारित बनाया जाना चाहिए। उन्होंने गुरु-शिष्य परम्परा, समग्र विकास, नैतिक नेतृत्व, अनुभवात्मक अधिगम और सामाजिक उत्तरदायित्व को आधुनिक यूनिवर्सिटीज़ के लिए अति महत्वपूर्ण बताया।
एसोसिएट डीन अकादमिक डॉ. अमित कंसल ने टीएमयू की शैक्षणिक उपलब्धियों और भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र की गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा, केंद्र राष्ट्रीय एवम् अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय ज्ञान प्रणाली के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कॉलेज ऑफ फिजियोथेरेपी की प्राचार्या प्रो. शिवानी एम. कौल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा, यह कॉन्क्लेव भारतीय शिक्षा की गौरवशाली परम्परा, गुरु-शिष्य संबंध और नैतिक मूल्यों को समकालीन शिक्षा से जोड़ने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र की समन्वयक डॉ. अलका अग्रवाल ने स्वागत भाषण में कहा, द्वापर युग भारतीय शिक्षा के संस्थागत विकास का महत्वपूर्ण काल था। भारतीय ज्ञान प्रणाली के मूल सिद्धांत आज भी समकालीन शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा प्रदान करने की क्षमता रखते हैं। कॉन्क्लेव में देश के विभिन्न राज्यों से शिक्षाविदों, शोधार्थियों, संकाय सदस्यों और स्टुडेंट्स ने ऑनलाइन भारतीय ज्ञान परम्परा, गुरुकुल शिक्षा, राजकीय शिक्षण संस्थानों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में गहनता से सार्थक विचार-विमर्श किया। संचालन डॉ. माधव शर्मा ने किया।



