उत्तराखंड में नफरती अपराधियों को बक्शया जा रहा है: राज्य और देश भर के जन संगठन, विपक्षी दल

त्रिपुरा के आदिवासी छात्र एंजेल चकमा की बर्बर हत्या के बाद देश भर के लोग इस अपराध पर आवाज़ उठा रहे हैं। आज राष्ट्रपति के नाम पर एक खुला खत द्वारा राज्य और देश भर के जन संगठनों एवं विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि इस घटना में प्रशासन की और से जो कथित लापरवाही एवं असंवेदनशीलता जो दिखाए दिया, वह राज्य के वर्त्तमान माहौल में कोई असाधारण बात नहीं है, बल्कि यह एक और उदहारण है जिसमें नफरती अपराधियों को बख्शने की कोशिश की गयी है। 2023 में पुरोला, 2024 में देहरादून और उत्तरकाशी, 2025 में नैनीताल, इन सारे इलाकों में आपराधिक हिंसक अभियान हुए हैं जिनकी वजह से निजी और सरकारी सम्पतियों पर नुक्सान हुआ है और पुलिस एवं आम आम नागरिक घायल हुए हैं – लेकिन इन सारी घटनाओं में किसी भी ज़िम्मेदार व्यक्ति पर कोई गंभीर कार्यवाही होती हुई नहीं दिखाई दे रही है। इस प्रकार के अनेक और नफरती अपराधें बीते आठ साल में हुए हैं जिससे यह लगता है कि राज्य में सत्ताधारी दल और उनके विचारधारा से करीब हिंसक संगठनों को बख्शा जा रहा है।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने यह भी कहा कि उत्तराखंड वह धरती है, जहाँ पर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, श्रीदेव सुमन, नागेंद्र सकलानी, जयानंद भारती और ऐसे अनेक नायकों ने इंसानियत, लोकतंत्र, समानता और आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान की। राज्य सरकार और प्रशासन द्वारा इस प्रकार की आपराधिक गतिविधियों को संरक्षण देना हमारे संविधान और कानून का राज के खिलाफ है। खुला खत द्वारा हस्ताक्षरकर्ताओं ने राष्ट्रपति से मांग की कि राज्य सरकार से इन आपराधिक गत्तिविधियों पर जवाब माँगा जाये, और सरकार को हिंसक संगठनों एवं व्यक्तियों पर सख्त कार्यवाही करने को निर्देशित किया जाए।
हस्ताक्षरकर्ताओं में उत्तराखंड के विपक्षी दल के नेताओं और राज्य के विभिन्न जन संगठनों के साथ उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, बिहार, असम और अन्य राज्यों के संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल है।
खुला खत और हस्ताक्षर सूचि सलग्न।
*खुला खत*
सेवा में
महामहिम राष्ट्रपति
भारत सरकार
महामहिम,
उत्तराखंड वह धरती है, जहाँ पर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, श्रीदेव सुमन, नागेंद्र सकलानी, जयानंद भारती और ऐसे अनेक नायकों ने इंसानियत, लोकतंत्र, समानता और आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान की। लेकिन कुछ समय से देश और दुनिया देख रही है कि इस राज्य में नफरती अपराधियों को बख्शने एवं गैर क़ानूनी नफरती प्रचार करने की कोशिश की जा रही है।
उत्तर पूर्व के आदिवासी छात्र एंजेल चकमा की बर्बर हत्या इसका एक उदाहरण है जिसपर पुरे देश में अभी लोक आवाज़ उठा रहे हैं। लेकिन इस शर्मनाक घटना में प्रशासन की और से जो लापरवाही एवं असंवेदनशीलता जो दिखाए दिया, वह इस राज्य के वर्त्तमान माहौल में कोई असाधारण बात नहीं है, बल्कि यह एक और उदहारण है जिसमें नफरती अपराधियों को बख्शने की कोशिश की जा रही है।
महामहिम, सच्चाई यह है कि राज्य में लगातार सत्ताधारी दल और उनके विचारधारा से करीब अपराधियों को बख्शा जा रहा है। नवंबर 2024 में उत्तरकाशी में हुई हिंसा में पुलिस कर्मचारी सहित 27 लोग घायल हो गए थे। इस साल की मई महीने में नफरती हिंसा के दौरान नैनीताल में दुकानों को तोड़ी गयी थी, पुलिस दरोगा की मारपीट हुई थी और स्थानीय व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। सेलाकुई और रामनगर में लोडर गाड़ियों के ड्राइवरों पर जानलेवा हमले हुए हैं। नवंबर और दिसम्बर महीने में ही हल्द्वानी, देहरादून और खटीमा में हिंसक घटनाएं हुई हैं। पुरोला, रामनगर, हल्द्वानी, उत्तरकाशी, और अनेक ऐसी अन्य घटनाओं में यह भी साबित हुआ है कि जिस आरोप के बहाने हिंसक अभियान किया गया था, वह आरोप ही गलत था।
यह सिर्फ कुछ उदहारण है। लेकिन इन सारे आपराधिक षड्यंत्रों को ले कर किसी भी ज़िम्मेदार व्यक्ति या संगठन पर कोई भी कार्यवाही नहीं दिख रही है। यहाँ तक कि उत्तरकाशी, नैनीताल और रामनगर की घटनाओं को ले कर उच्च न्यायालय के आदेशों का भी पालन नहीं हो रहा है।
महामहिम, सरकार और प्रशासन द्वारा इस प्रकार की आपराधिक गतिविधियों को संरक्षण देना हमारे संविधान और कानून का राज के खिलाफ है। वैसे तो पूरे देश में पिछले एक दशक से लेकर साम्प्रदायिक घटनाएं बढ़ी है और हत्याएं भी हुई हैं, परंतु हम विशेष रूप से उत्तराखंड के विषय पर आपका ध्यान लाना चाह रहे हैं।
अतः आपसे हम विनम्र निवेदन करना चाहेंगे कि राज्य सरकार से जवाब माँगा जाये कि ऐसी आपराधिक एवं गैर संवैधानिक गतिविधियों को अंजाम क्यों दिया जा रहा है, और साथ साथ में प्रशासन को निर्देशित किया जाये कि वह इन पर तुरंत कार्यवाही कर रोक लगा दे। उच्चतम न्यायलय के 2018 के आदेशों का पालन आज तक राज्य में नहीं हुआ है। उनपर तुरंत युद्धस्तर पर कदम उठाने की ज़रूरत है।
निवेदक
_उत्तराखंड से_
राजीव लोचन साह, अध्यक्ष, उत्तराखंड लोक वाहिनी
समर भंडारी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी
डॉ SN सचान, राष्ट्रीय सचिव, समाजवादी पार्टी
इंद्रेश मैखुरी, राज्य सचिव, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा – ले)
अमरजीत सिंह, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता
विनोद बडोनी, शंकर गोपाल, राजेंद्र शाह – चेतना आंदोलन
तरुण जोशी, वन पंचायत संघर्ष मोर्चा
हीरा जंगपांगी, महिला किसान अधिकार मंच
भुवन पाठक, अजय जोशी एवं शंकर बर्थवाल, सद्भावना समिति उत्तराखंड
इस्लाम हुसैन, उत्तराखंड सर्वोदय मंडल
नरेश नौडियाल, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी
अरण्य रंजन, सामाजिक कार्यकर्ता
अनूप नौटियाल, सामाजिक कार्यकर्ता
माया चिलवाल और गीता गैरोला, उत्तराखंड महिला मंच
जगमोहन मेहंदीरत्ता, AIBEA
मुशर्रफ अली, अध्यक्ष, उत्तराखंड अल्पसंख्यक सेवा मोर्चा
भोपाल, क्रन्तिकारी लोक अधिकार संगठन
कमलेश कंथवाल, भारत ज्ञान विज्ञानं समिति
मीर हमजा, वन गुज्जर ट्राइबल युवा संगठन
साहब सिंह सजवाण, सर्वोदय मंडल
राजेश सकलानी, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता
परिवर्तनकामी छात्र संगठन
स्वाति नेगी, सामाजिक कार्यकर्ता
हेमा जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता
यतीश पंत, सामाजिक कार्यकर्ता, हल्द्वानी
_अन्य राज्यों से_
आशीष रंजन, जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM), बिहार
मीरा संघमित्रा,जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM),हैदराबाद
रामकुमार, उपाध्यक्ष, PUCL उत्तर प्रदेश
प्रवीर पीटर, साझा कदम, झारखण्ड
अधिवक्ता अख्तर चौधरी, अधिवक्ता बिलाल, अधिवक्ता दीपक शर्मा – अफ़कार इंडिया फाउंडेशन
अरुंधति धुरु, जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM), उत्तर प्रदेश
सुरेश राठौड़, मनरेगा मज़दूर यूनियन, उत्तर प्रदेश
अलोक शुक्ला, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन
राजेश रामकृष्णन, ICAN, चेन्नई
भंवर मेघवंशी, प्रदेश अध्यक्ष, पीयूसीएल राजस्थान
गुफरान, पीपल्स अलायन्स, अयोध्या
लाल प्रकाश रही, दिशा, जौनपुर
बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ, जबलपुर,मध्य प्रदेश
चन्दन सरोज, अखिल भारतीय छात्र संगठन, मध्य प्रदेश
राकेश राइडर, बिहार नागरिक मोर्चा
अधिवक्ता तान्या, असम
कुशीनारा फाउंडेशन – कुशीनगर
अधिवक्ता अभिषेक आनंद, पटना उच्च न्यायलय
एस के एम एस, सीतापुर, उत्तर प्रदेश



