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छह साल में सरकारी स्कूलों से 71,671 छात्रों ने छोड़ा किनारा

Sarthak Prayash Admin
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देहरादून। उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या लगातार घट रही है। पिछले छह वर्षों में करीब 71,671 छात्रों ने सरकारी स्कूलों से किनारा कर लिया। वर्ष 2019-20 में कक्षा एक से 12वीं तक सरकारी विद्यालयों में 5,77,534 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत थे। वर्ष 2025-26 में यह संख्या घटकर 5,05,853 रह गई है।

प्रदेश में वर्तमान में 16 हजार से अधिक सरकारी विद्यालय संचालित हो रहे हैं। इनमें 5,834 स्कूल ऐसे हैं, जहां छात्र संख्या 20 से भी कम रह गई है। वहीं, पिछले नौ वर्षों में प्रदेश में केवल नौ नए सरकारी स्कूल खोले गए हैं। लगातार घटती छात्र संख्या आने वाले समय में शिक्षा विभाग के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

सुविधाएं और शिक्षक पर्याप्त, फिर भी घट रहे छात्र

सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक और भवन जैसी सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद छात्र संख्या लगातार कम हो रही है। ऐसे में सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता, शैक्षणिक माहौल और उपलब्ध सुविधाओं को निजी विद्यालयों के समकक्ष बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है। विभाग के सामने अभिभावकों का भरोसा सरकारी स्कूलों की ओर लौटाने की चुनौती भी है।

दो साल पहले बनी रिपोर्ट, सुझावों पर नहीं हुआ अमल

वर्ष 2024-25 में शिक्षा विभाग ने तत्कालीन अपर राज्य परियोजना निदेशक, समग्र शिक्षा कुलदीप गैरोला की अगुवाई में सात विशेषज्ञ शिक्षकों की समिति गठित की थी। समिति को राजकीय प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में घटती छात्र संख्या के कारणों का अध्ययन कर सुधार के सुझाव देने थे।

समिति ने अध्ययन के बाद विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर विभाग को सौंप दी थी। रिपोर्ट में छात्र संख्या बढ़ाने के लिए कई सुझाव दिए गए थे, लेकिन इन सुझावों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी।

109 माध्यमिक और 3,799 प्राथमिक स्कूलों में 20 से कम छात्र

सरकारी विद्यालयों में छात्र संख्या में गिरावट का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेश के 109 माध्यमिक विद्यालयों और 3,799 प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या 11 से 20 के बीच रह गई है। बड़ी संख्या में ऐसे विद्यालय भी हैं, जहां इससे भी कम छात्र अध्ययनरत हैं।

हर साल अप्रैल में प्रवेशोत्सव, नहीं बढ़ रहा नामांकन

सरकारी विद्यालयों में छात्र नामांकन बढ़ाने के लिए हर वर्ष अप्रैल में प्रवेशोत्सव आयोजित किया जाता है। इसके तहत शिक्षकों और विभागीय स्तर से अभियान चलाकर बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या बढ़ने के बजाय लगातार घट रही है। इससे प्रवेशोत्सव और नामांकन बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

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