उत्तराखंड

बस्ती वाले कानून पर अमल हो, नियम की धज्जियां न उड़ाई जाये!

दस साल पहले, 2016 में ही, राज्य में मज़दूर बस्ती एवं किफायती आवास पर क़ानूनी ढांचा बना था जिसे राज्य के हर ज़िले में इसपर कार्यवाही हो सकती थी, और इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकता था। लेकिन वर्त्तमान सरकार ने उसपर अमल ही नहीं किया और उस कानून के खिलाफ एवं 2018 के अधिनियम के धारा 4 के विरोध में भी, शहर के मेयर एवं मुख्यमंत्री आवास से सकारात्मक आश्वासन मिलने के बाद, बार बार कांठ बंगला जैसी बस्तियों में गैर क़ानूनी तरीकों से हटाने की धमकी दी जा रही है।  इस आरोप को लगाते हुए आज विपक्षी दलों एवं जन संगठनों के साथ कांठ बंगला एवं अन्य बस्तियों के एक प्रतिनिधि मंडल मुख्यमंत्री आवास पर ज्ञापन सौंपवाया। ज्ञापन द्वारा 2016 के अधिनियम और नियमावली के धाराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हर ज़िले में जिला स्तरीय समिति 2017 में बननी चाहिए थी और इन समितियों के द्वारा मज़दूर बस्तियों का चिन्हीकरण एवं उनके लोगों से वार्ता करते हुए हर बस्ती के लिए योजना बनना चाहिए था। इन प्रक्रियाओं पर अमल करने से शहरों में आवास की बढ़ती कीमतें एवं शहरों में सफाई, स्वास्थ्य, पर्यावरण पर नुक्सान और अन्य समस्याओं में भी सुधार आ सकता है।  यही अनुभव अन्य राज्यों जैसे ओडिशा, मध्य प्रदेश का रहा है।  लेकिन उल्टा यहाँ पर 2016 के अधिनियम एवं 2018 के अधिनियम की  बार बार धज्जियाँ उड़ाई जा रही है।  इसलिए कांठ बंगला बस्ती पर हो रही गैर क़ानूनी कार्यवाही पर तुरंत रोक लगा कर 2016 की नियमावली के अनुसार पुरे राज्य में मज़दूर बस्तियों का सवाल का स्थाई समाधान पर सरकार कदम उठाये।   

सालावाला पुल के पास इकट्ठे होकर प्रतिनिधियों ने पुलिस से वार्ता की। फिर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संजय शर्मा और प्रवीण त्यागी, सर्वोदय मंडल के हरबीर सिंह कुशवाहा, चेतना आंदोलन के शंकर गोपाल एवं सुनीता देवी, और कांठ बंगला बस्ती के दो प्रतिनिधि मुख्यमंत्री आवास में जा कर लोक संपर्क अधिकारी हरीश कोठारी से वार्ता की।  प्रतिनिधियों ने उनको याद दिलाई कि दिसम्बर महीने में भी उनसे वार्ता हुई थी लेकिन अभी फिर 2018 के कानून के धारा 4 के खिलाफ कांठ बंगला बस्ती को हटाने की बात हो रही है।  उन्होंने 2016 के कानून के बारे में भी बात रखी। वार्ता के बाद मामला शहरी विकास सचिव को मार्क करते हुए लोक संपर्क अधिकारी ने आश्वासन दिया कि इसपर गंभीर विचार किया जायेगा और समाधान निकाला जायेगा।  

ज्ञापन सलग्न।  

निवेदक 
दून समग्र विकास अभियान    

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सेवा में,

माननीय मुख्यमंत्री महोदय

उत्तराखंड सरकार

विषय: 2016 से प्रशासन मलिन बस्ती कानून पर अमल न करने के संबंध में

महोदय,

हम आपके संज्ञान में एक बेहद गंभीर बात लाना चाह रहे हैं। हाल में देहरादून के कांठ काठबंगला क्षेत्र में फिर लोगों को गैर क़ानूनी तरीकों से बेदखली करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इसके साथ साथ हम आपके संज्ञान में लाना चाह रहे हैं कि   2016 में ही विधान सभा द्वारा पारित कानून और उसके अंतर्गत बनी नियमावली में इस प्रकार की स्थितियों के लिए स्थाई समाधान के लिए स्पष्ट रास्ता था, जिसपर अमल करना प्रशासन का क़ानूनी फ़र्ज़ था।    :

गौरतलब है कि इन क्षेत्रों में 2011 की जनगणना के अनुसार कम से कम तीस प्रतिशत जन आबादी रह रहे हैं, और वह वहां पर इसलिए रह रहे हैं क्योंकि इन तबकों के लिए शहरों के बाकी मोहल्लों में न खरीदने के लिए मकान मिल सकते हैं और न ही किराय पर।  तो यह अतिक्रमण का सवाल नहीं है,  यह गलत नीतियों की वजह से बनी आवास की कमी का सवाल है।  इन क्षेत्रों का नियमितीकरण एवं विकास करने से आवास की बढ़ती कीमतें एवं शहरों में सफाई, स्वास्थ्य, पर्यावरण पर नुक्सान और अन्य समस्याओं में भी सुधार आ सकता है।

बीते कुछ सालों से बस्तियों की लगातार बेदखली करने का प्रयास से समाज एवं पर्यावरण को कोई लाभ नहीं मिला है।  कांठ बंगला बस्ती इसका एक बड़ा उदहारण है।   2016 के उत्तराखंड राज्य की नगर निकायों में अवस्थित मलिन बस्तियों के सुधार, विनियमितीकरण, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यस्थापन एवं अतिक्रमण निषेध अधिनियम और उसके अंतर्गत बनाई गई नियमावली के आधार पर, इसका स्थायी समाधान दस साल पहले ही होना चाहिए था।  जैसे कि:

– नियम 3 के अनुसार राज्य के हर ज़िले में जिला स्तरीय समिति का गठन  होना चाहिए था जो हर महीने में दो बार बैठे।  बस्तियों में सर्वेक्षण कर हर निर्वासित परिवार को पहचान पत्र दिया जाय, चाहे वह कभी भी बसे और किसी भी प्रकार की ज़मीन पर भी बसे  (नियम 3(2) के अनुसार यह काम 2017 में ही होना चाहिए था)

– नियम 6 के अनुसार बस्तियों को तीन श्रेणियों में बाँट कर ड्राफ्ट सूची को सार्वजनिक रूप में पेश किया जाये। जनता को आपत्ति देने के लिए मौका दिया जाये और पारदर्शिता के साथ हर बस्ती के लिए योजना बताया जाये।  यह काम 6 महीने के अंदर हो सकता है। पात्रता को तय करने के लिए नियम 4(क) के अनुसार हर दस्तावेज को देखा जाये, सिर्फ बिजली और पानी के बिलों को नहीं।  परिवार की परिभाषा में पति, पत्नी, अविवाहित बच्चे, एवं माँ पिता शामिल होते हैं (नियम 2(ग))

– इस प्रयास के बाद नियम 8 में दिए गए रेट के अनुसार भू स्वामित्व के अधिकार बस्ती में रहने वाले परिवारों को सौंपा जाये।  नियम 8(12) के अनुसार एक परिवार को एक ही स्थान पर अधिकार दिया जाये, और सिर्फ उन लोगों को दिया जाये जिनके उस शहर में कोई और मकान या ज़मीन न हो। नियम 8(13) के अनुसार विरासत के आलावा किसी और प्रकार स्थानांतरण पर रोक लगाया जाये।  
 
– अगर किसी क्षेत्रों को ले कर जनता से वार्ता होने के बाद प्राकृतिक खतरें, पर्यावरण की सुरक्षा या अन्य कारणों से लगता है कि कुछ परिवारों का पुनर्वास की ज़रूरत है, नियम 10(3) के अनुसार प्रभावित लोगों और ख़ास तौर पर महिलाओं से वार्ता कर उनकी सहमति से पुनर्वास योजना बनाया जाये।  पुनर्वास स्थान उनकी आजीविका के स्थान से अधिकतम दो किलोमीटर की दूरी पर होना चाहिए और अगर मकान का आवंटन होगा, तो प्रधान मंत्री आवास योजना के नियमावली के तहत चार सदस्य परिवार के लिए उस मकान का क्षेत्रफल कम से कम 30 से 45 वर्ग मीटर होना चाहिए।  

जब 2016 में इस क़ानूनी ढांचा को बनाया गया था, नियम के अनुसार उसका अमल एक ही साल के अंदर होना चाहिए था।  इसलिए 11 मार्च 2016 से पहले में रह रहे लोगों को अधिकार देने का प्रावधान दिया गया था।  अब लगभग एक दशक बीत गया और प्रशासन ने इसपर कोई कार्यवाही नहीं की है।  इसलिए जिस दिन से इस नया योजना पर कार्यवाही शुरू होती है, उससे एक साल पहले से जो लोग रह रहे हैं, उनको अधिकार दिया जाना चाहिए।  

कांठ बंगला बस्ती में इन सारे नियमों की धज्जिया उड़ाई जा रही है और साथ साथ में 2018 के उत्तराखंड नगर निकायों और प्राधिकरणों हेतु विशेष प्राविधान अधिनियम के धारा 4(3) का भी सीधा उलंघन हो रहा है।  
अगर विधान सभा द्वारा पारित कानून पर प्रशासन एक दशक तक अमल ही नहीं करेगा, तो यह इस राज्य में कानून का राज पर सवाल है।  इसके आलावा जब 2016 से पहले रह रहे लोगों पर भी हटाने की धमकियाँ दी जा सकती है, जबकि यह सीधा कानून के खिलाफ है, तो से भी लगता है की प्रशासन पूरी तरह से मनमानी से काम कर रहा है।  
अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि कांठ बंगला बस्ती पर हो रही गैर क़ानूनी कार्यवाही पर तुरंत रोक लगा कर 2016 की नियमावली के अनुसार पुरे राज्य में मज़दूर बस्तियों का सवाल का स्थाई समाधान पर सरकार कदम उठाने की कोशिश करे.

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