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आज गुरु पूजन का पावन पर्व, जानिए पौराणिक महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Ramesh Kuriyal
3 Min Read

देहरादून।

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा इस वर्ष 29 जुलाई 2026 (बुधवार) को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जा रही है। भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। मान्यता है कि गुरु ही अपने शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। इसी कारण इस दिन गुरु पूजन का विशेष महत्व माना गया है।

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि महाभारत के रचयिता और वेदों के विभाजनकर्ता महर्षि वेदव्यास का जन्म इसी दिन हुआ था। उनके सम्मान में यह पर्व मनाया जाता है और ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने वाले सभी गुरुओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।

गुरु का स्थान सर्वोच्च

शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु के बिना ज्ञान और ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है। प्रसिद्ध दोहा “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय” गुरु के महत्व को स्पष्ट करता है। प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरुकुलों में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण रखते थे। एकलव्य की गुरु भक्ति इसका सर्वोत्तम उदाहरण मानी जाती है।

गुरु पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

मान्यता है कि वर्षा ऋतु के आरंभ में आने वाली गुरु पूर्णिमा से साधु-संत एक स्थान पर रहकर चार माह तक धर्म, ज्ञान और आध्यात्मिक शिक्षा का प्रसार करते हैं। इस अवधि को अध्ययन और साधना के लिए सबसे उपयुक्त समय माना गया है।

पूजा विधि

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद अपने गुरु या गुरु के चित्र का विधिवत पूजन करें। चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित कर गुरु मंत्र का जाप करें तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। यदि गुरु साक्षात उपस्थित न हों तो उनके चित्र या भगवान वेदव्यास का पूजन भी किया जा सकता है।

चंद्रग्रहण का प्रभाव नहीं

इस वर्ष गुरु पूर्णिमा के दिन मान्ध (उपच्छाया) चंद्रग्रहण भी पड़ रहा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह उपच्छाया ग्रहण होने के कारण धार्मिक दृष्टि से प्रभावी नहीं माना गया है। इसलिए सूतक काल लागू नहीं होगा और पूजा-पाठ व धार्मिक कार्य सामान्य रूप से किए जा सकेंगे।

संदेश

गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि अपने जीवन में ज्ञान देने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। भारतीय संस्कृति का यह पर्व गुरु-शिष्य परंपरा की अमूल्य विरासत को सहेजने का संदेश देता है।

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