
उत्तराखंड के नगर निगमों में मेयर और अन्य जनप्रतिनिधियों के खर्च को लेकर अब तक कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं बन पाई है। सरकारी गाड़ियों के उपयोग, ईंधन खर्च और अन्य सुविधाओं की सीमा तय करने के लिए कोई स्पष्ट शासनादेश मौजूद नहीं है, जिससे खर्चों में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
इस मुद्दे पर सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगे जाने के बाद मामला सूचना आयोग तक पहुंचा। आयोग के निर्देश पर शहरी विकास विभाग ने मेयर और उप मेयर के भत्तों व सुविधाओं को लेकर प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा, लेकिन यह प्रस्ताव पिछले तीन वर्षों से लंबित है। हाल ही में सचिवालय की ओर से जवाब दिया गया है कि प्रस्ताव पर “कार्यवाही गतिमान” है।
दरअसल, रुड़की निवासी अमित अग्रवाल ने फरवरी 2023 में नगर निगम से मेयर पर होने वाले खर्च की सीमा से संबंधित जानकारी मांगी थी। जवाब में स्पष्ट जानकारी न मिलने पर उन्होंने मामला सूचना आयोग में उठाया। इसके बाद 14 नवंबर 2023 को राज्य सूचना आयुक्त योगेश भट्ट ने शहरी विकास सचिव को इस संबंध में स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे।
आयोग ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह गंभीर स्थिति है कि राज्य गठन के 25 साल बाद भी नगर निगमों में मेयर और उप मेयर के भत्तों व सुविधाओं के लिए स्पष्ट नियम नहीं हैं। फिलहाल उत्तराखंड में व्यवस्थाएं अभी भी उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम 1959 के तहत संचालित हो रही हैं, जिसमें भी खर्च की स्पष्ट सीमा निर्धारित नहीं है।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2022-23 के दौरान 15 महीनों में मेयर की गाड़ी के ईंधन, मरम्मत और कर्मचारियों के वेतन पर करीब 25 लाख रुपये खर्च किए गए। बावजूद इसके, खर्च की कोई तय सीमा न होने से पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आयोग ने यह भी कहा कि नगर निगमों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन खर्च को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश न होने से असमंजस की स्थिति बनी हुई है।



